मधेपुरा : उदाकिशुनगंज में धड़ल्ले से चल रही अवैध खाद बीज की दुकानें, विभाग अनजान

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कौनैन बशीर
वरीय उप संपादक

मधेपुरा/बिहार : कृषि विभाग की लापरवाही के कारण जिले के उदाकिशुनगंज मुख्यालय से ग्रामीण इलाके तक गली-गली बीज की दुकानें बिना लाइसेंस के खुल गई हैं। जहाँ किसानों को दिनदहाड़े चूना लगाया जा रहा है। अफसरों के कार्रवाई न करने से दुकानदारों के हौसले बुलंद हैं। यह दुकानदार बीज, रासायनिक व कीटनाशक को दो से तीन गुने दाम में बेच रहे हैं।

मिली जानकारी के अनुसार अनुमंडल क्षेत्र में अवैध रूप से खाद- बीज की दुकानें चल रही हैं। इन दुकानों से लोग खाद बीज की खरीददारी कर रहे हैं। जिसे लोगों को पता नहीं की बिज सही है। जानकारी के अभाव में किसान इन्हीं सब दुकानों से खरीदारी कर अपने खेतों में खाद बीज दे रहे हैं। इतना ही नहीं इसके कारण लोगों के स्वास्थ्य खराब होने के साथ-साथ विभाग को भी लाखों रुपये का चुना लग रहा है।

बताया जाता है कि मुख्यालय बाजार में ही नही ग्रामीण इलाकों में भी जगह-जगह अवैध रूप से दुकान चलायी जा रही है। अवैध रूप से खाद बीज की दुकानें चलाने वाले इन दुकानदारों के पास अनुभव भी नहीं रहता है। अंदाज करके खाद और बीज किसानों को दे देते हैं। अगर इस पर जल्द ही अंकुश नहीं लगाया गया तो किसानों को फसलों की खेती बर्बाद हो जायगी।

सूत्रों का कहना है कि अवैध रूप से दुकानदार अपनी मोटी कमाई करने के लिए वैसे किसानों की खोज करते है। जिन्हें लागत कम और फसल ज्यादा चाहिए हो। वैसे किसानों को ये दुकानदार एक्सपायर खाद बीज के साथ साथ कीटनाशक दे देते हैं। किसान खाद बीज और कीटनाशक का उपयोग कर फसल तैयार कर बाजारों में बेच देते है। जब उस फसल को लोग ग्रहण करते है तो उन्हें तरह-तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ता है। इस सब पर नकेल कसने के लिए विभाग के उदाकिशुनगंज कृषि विभाग पूरी तरह सुस्त हैं। जिसके कारण अवैध रूप से खाद बीज का दुकान चलाने वालों का हौसला बुलंद है। जिसके कारण लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ रहा है।

इस बाबत पूछे जाने पर प्रखंड कृषि पदाधिकारी उमेश बैठा ने बताया उदाकिशुनगंज प्रखंड में कुल 42 दुकानें रजिस्टर्ड हैं। उसके बाद भी अगर अवैध रूप से कोई दुकान चला रहा है तो वैसे दुकानदार पर कार्यवाही की जाएगी।

 बहरहाल उदाकिशुनगंज प्रखंड के कृषि विभाग के सुस्ती के कारण किसान ही नही जनता भी परेशान हैं। किसानो का आरोप हैं की कृषि के योजना पूरी तरह कागच पर ही सिमटकर रह जाती हैं। मुआवजा से लेकर बीज तक की जानकारी सही किसानों तक नहीं पहुँच पाती हैं। मुहबोला एवं संपर्क में रहने वाले लोगों को ही लाभ दिया जाता है।


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