मजदूरों के अधिकार और हमारा दायित्व  

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        आज 1मई अर्थात् “अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस” है । यकीनन आज मज़दूरों के अधिकारों को याद करने का सुनहरा दिन है। वैसे तो हमारा देश कोविड-19 जैसी वैश्विक महामारी की चपेट में है और इससे बचाव के मद्देनजर सम्पूर्ण देश में लाकडाउन की स्थिति बनी हुई है। लाकडाउन की वजह से हम सब की जिंदगियाँ मानो ठहर सी गई हैं। हालांकि लाकडाउन का पालन और शारिरीक दूरी बनाए रखने में ही हम सबों की भलाई है ताकि इस महामारी से निजात मिल सके।महामारी की भयावहता ने यूँ तो हर किसी को प्रभावित किया है परंतु मजदूरों की स्थिति अति दयनीय हो गई है। जहाँ एक ओर उनके सामने भूख की समस्या है वहीं उनसे उनके रोजगार के छिन जाने का बेहद गम भी है। सरकार के लाख आश्वासनों के बावजूद भी उनकी समस्याओं पर कोई ठोस पहल नहीं हो रही है। ऐसे समय में जबकि लोग अपने अपने घरों में कैद हैं, प्रवासी मजदूरों का अपने घरों से कोसों दूर शहरों में अजनबियों की तरह होना भी किसी विपदा से कम नहीं है। इस संकट के समय उन्हें अपने बच्चे, बूढ़े माँ बाप ,घर परिवार और वतन की याद भी सता रही है। आवागमन बाधित होने से वह बेबस है पर वह किसी तरह अपनों के पास लौट आना चाहता है।

           जिन मजदूरों ने अपने खून पसीने और कठोर परिश्रम से देश का निर्माण किया है आज वही अपनी भूख मिटाने के लिए दूसरों पर आश्रित होकर खाना लेने लाईनों में खड़ा है।सामाजिक, धार्मिक व छात्र संगठनें उनके खाने पीने की व्यवस्था करती हुई नजर आ रही हैं वहीं सरकार उनकी सहायता के लिए महज कुछ रूपयों का इंतजाम कर रही हैं पर क्या इससे उनके हालात बदल जाएँगे। मजदूरों के हालात को सुधारने के ठोस पहल आज भी नहीं हो रहे।

इस्लाम ने 1438 साल पहले ही तय कर दिया कि उनको सिर्फ एक दिन याद करने के  लिए नहीं बल्कि ज़िंदगी में अमल करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

एक बार जगत गुरु हजरत मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) अपने साथियों के साथ बैठे हुए थे और सुबह के शुरुआती घंटों में काम करने में एक जवान आदमी व्यस्त था। साथियों ने उसे देखा और टिप्पणी की कि वह कितना फायदेमंद होगा यदि वह अल्लाह की इबादत  में अपना वक़्त देता ,आप (सल्ल०)ने जब  यह सुना, तो आप (सल्ल०) ने उनसे कहा: “ऐसा मत कहो! क्योंकि अगर वह स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होने के लिए काम कर रहा है, तो वह अल्लाह  के रास्ते में है। यहां तक ​​कि अगर वह अपने परिवार का समर्थन करने के लिए जीवित रहने का प्रयास कर रहे हैं, तो भी यह एक महान कार्य होगा।” 

           इस से हम इस्लाम में श्रम के महत्व को सीखते हैं और समाज में विकास को बढ़ावा देने के लिए इसे बहुत प्रोत्साहित किया जाता है। उसी समय, उसने श्रमिकों को प्रबंधित करने और उन्हें दुरुपयोग या शोषण करने से रोकने के लिए कानूनों की स्थापना की है।

ट्रेड यूनियनों या श्रमिक यूनियनों के अस्तित्व में होने के कुछ समय पहले ही यह सपना देखा गया था कि मालिक  और मज़दूर  के बीच के रिश्ते कैसे होने चाहिए? 

इस्लाम के पैगंबर हजरत मुहम्मद(सल्ल०)ने एक मालिक  के रूप में और एक कर्मचारी के रूप में , दोनों प्रकार का काम किया।इस्लाम के अंतिम संदेष्टा हजरत मुहम्मद (सल्ल०) ने अपने जीवन के शुरुआती वर्षों में एक चरवाहे  के रूप में एक मजदूर का काम किया और फिर बाद में एक सफल व्यापारी भी बने।

       पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ) ने कहा कि “आपके कर्मचारी आपके भाई हैं, जिन पर अल्लाह ने आपको अधिकार दिया है, इसलिए यदि किसी मुस्लिम के पास उसके नियंत्रण में कोई अन्य व्यक्ति है, तो उसे उन्हें खाने के लिए  वही खाना देना चाहिए जो खुद खाए, जो लोग पहनते हैं, उन्हें पहनने के लिए वैसे ही कपड़े देने चाहिए और उतना ही बोझ देना चाहिए  जितना वो बर्दाश्त कर सके! उसके काम में उसकी मदद भी करनी चाहिए।”

आप(सल्ल०) ने कहा कि “मैं उन लोगो के खिलाफ क़यामत के दिन गवाही दूंगा जो किसी आज़ाद आदमी को ग़ुलाम बनाये और मज़दूर की मज़दूरी तय करने के बाद न दे!”

आप (सल्ल०) ने कहा कि किसी को “मज़दूरी पर रखो तो पहले मज़दूरी तय कर लो!” और जगत गुरू हजरत मुहम्मद (सल्ल०) का कहा हुआ ये वाक्य तो दुनिया भर के मज़दूरों की हिमायत का पहला चार्टर है कि “मज़दूर की मज़दूरी उसका पसीना सूखने से पहले दे दो!”

         अंतरराष्ट्रीय श्रमिक दिवस अर्थात् मई दिवस 1886 में शिकागो में आरंभ हुआ। श्रमिक मांग कर रहे थे कि काम की अवधि आठ घंटे हो और सप्ताह में एक दिन का अवकाश हो। इस दिन श्रमिक हड़ताल पर थे। इस हड़ताल के दौरान एक अज्ञात व्यक्ति ने बम फोड़ दिया तत्पश्चात् पुलिस गोलाबारी में कुछ मजदूर मारे गए, साथ ही कुछ पुलिस अफसर भी मारे गए। भारत में मई दिवस पहली बार वर्ष 1923 में मद्रास में मनाया गया जिसका सुझाव सिंगारवेलु चेट्टियार नामक कम्यूनिस्ट नेता ने दिया था। उनका कहना था कि दुनियां भर के मजदूर इस दिन को मनाते हैं तो भारत में भी इसको मान्यता दी जानी चाहिए। इस प्रकार भारत में 1923 से इसे राष्ट्रीय अवकाश के रूप में मान्यता दी गई।

     आज जरूरत है कि इस महंगाई के समय में सरकारों को प्राइवेट कंपनियों, फैक्टरियों और अन्य रोजगार देने वाले माध्यमों के लिए एक कानून बनाना चाहिए जिसमें मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी तय की जानी चाहिए। मजदूरी इतनी होनी चाहिए कि जिससे मजदूर के परिवार को भूखा न रहना पड़े और न ही मजदूरों के बच्चों को शिक्षा से वंचित रहना पड़े। इसके साथ ही मजदूर दिवस के अवसर पर देश के विकास और निर्माण में बहुमूल्य भूमिका निभाने वाले लाखों मजदूरों के कठिन परिश्रम, दृढ़ निश्चय और निष्ठा का सम्मान करना चाहिए और मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए संपूर्ण राष्ट्र और समाज को सदैव तत्पर रहना चाहिए।

       आज जबकि हमारा देश महामारी के संकट भरे दौर से गुजर रहा है और भक्ति, उपासना और जनकल्याण का पवित्र माह रमजान भी दस्तक दे चुका है, हमारे लिए आवश्यक हो गया है कि मेहनतकश मजदूरों की सेवा में अग्रणी भूमिका निभाएँ।इन अवसरों पर बड़े बड़े आयोजन और कोड़े भाषण की अपेक्षा आज मजदूरों की वास्तविकता को समझने, उनके दर्द को महसूस करने और उनके सहायतार्थ वास्तव में पहल करने का इससे बड़ा अवसर शायद ही मिले।

मंजर आलम

(स्वतंत्र टिप्पणीकार)


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