भूख और भय का पैदल मार्च

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    भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक, सबसे बड़ा युवाओं तथा सर्वाधिक मानव श्रम शक्ति का देश है, जिस पर हम इतरा सकते हैं। देश के विकास में सर्वाधिक योगदान हमारे श्रमिकों- मजदूरों का रहा है, जिनके बदौलत हम खाद्यान्न एवं कई औद्योगिक उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के साथ अच्छे निर्यातक भी हैं।

लेकिन आज ‘ श्रममेव जयते ‘ का नारा ही सबसे अधिक संकट में आ गया है, जो आने वाले समय में देश के विकास के लिए बाधक सिद्ध हो सकता है। श्रमिकों-मजदूरों-कृषकों की अनदेखी और अपमान की बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है, क्योंकि यही वर्ग देश के 133 करोड़ जनसंख्या का वास्तविक प्रतिपालक है।

भारत में कोरोना का पहला संक्रमित मरीज 30 जनवरी को केरल में मिला तब तक वुहान की वस्तु-स्थिति सम्पूर्ण विश्व के सामने आ चुका था। इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि उसके बाद लाखों की संख्या में लोग विदेशों से भारत आये और अपने साथ कोरोना भी लाये। हमारे पास एहतियाती कदम उठाने का पर्याप्त अवसर था, लेकिन कुछ चुक एवं कुछ परिस्थितिजन्य गलती तो अवश्य हुई। 30 जनवरी के बाद ही अगर अंतराष्ट्रीय उड़ानें प्रतिबंधित कर दिया जाता अथवा विदेशों से भारत आये सभी लोगों के लिये स्क्रीनिंग और 14 दिनों का आईशोलेशन सख्ती के साथ अनिवार्य कर दिया जाता तो बहुत हद तक कोरोना के प्रसार को रोका जा सकता था। इसमें कोई दो मत नहीं कि भारत के उच्च आर्थिक सम्पन्न वर्ग ही कोरोना का संक्रमण लाये भी और फैलाये भी। कोरोना के संक्रमण के प्रसार में मजदूरों की भूमिका नगण्य है, लेकिन इससे सबसे ज्यादा प्रभावित व पीड़ित यहाँ के मजदूर वर्ग ही हैं।

25 मार्च से कोरोना संकट को लेकर जब प्रधानमंत्री ने सम्पूर्ण देश में लॉकडाउन लागू करने की घोषणा की तो सम्पूर्ण देश के नागरिकों ने इसका स्वागत किया। केन्द्र सरकार, राज्यों की सरकारें तथा हजारों स्वयंसेवी संस्थाओं ने फंसे लोगों की सहायता के लिए भोजन-पानी की हर संभव व्यवस्था करने का प्रयास किया। लेकिन कुछ ही दिन बाद ही दिल्ली, मुम्बई, सूरत, अहमदाबाद आदि कई शहरों में हताश मजदूर हजारों-लाखों की संख्या में सड़कों-बस अड्डों पर अपने-अपने घर जाने के लिए इकट्ठा हो गये, जो हमारी नाकाफी व दोषपूर्ण व्यवस्था की पोल तो अवश्य ही खोलती है। यहाँ की माटी, यहाँ का भूगोल और यहाँ की संस्कृति अद्वितीय है। यहाँ के लोग मरना भी अपने घरों में पसन्द करते हैं और अपनी संतान के हाथों गंगाजल ग्रहण कर ही प्राण त्यागने की इच्छा रखते हैं। भारत की संस्कृति का यही समग्र स्वरुप है।

बिहारी अपनी रोजी-रोटी व अपने परिवार का मात्र पेट पालने के उद्देश्य से आजादी के पूर्व से ही पलायन करते रहे हैं, जिसकी पुष्टि भिखारी ठाकुर के विभिन्न नाटकों से भी होती है, जिसमें पलायन के कारण पत्नी पति की विरह वेदना से किस प्रकार परेशान रहती है, इसका सजीव चित्रण एवं पलायन के दंश को रेखांकित करता है। आज भी 60 लाख से अधिक बिहारी देश के विभिन्न शहरों-प्रांतों में प्रवास करते हैं, जिसमें सर्वाधिक संख्या मजदूरों की है। सिर्फ दिल्ली में 10 लाख से अधिक प्रवासी बिहारी रहते हैं। बिहारी मजदूरों की विशिष्टता है कि  वे सिर्फ पेट भरने के लिए कमाते हैं, संचय इनके स्वभाव में प्रायः नहीं के बराबर होता है। लॉकडाउन  में भूखे मरने के भय से मजदूर हजारों-लाखों की संख्या में सैंकड़ों-हजारों किलोमीटर की यात्रा पर पैदल ही अपने परिवार व छोटे-छोटे बच्चों के साथ घर की ओर अनचाहे सफर पर निकल पड़े। भूख और भय का ऐसा पैदल मार्च भारत के इतिहास में इससे पहले कभी नहीं देखा गया। मजदूरों की भूख ने कोरोना पर भी अपनी श्रेष्ठता स्थापित कर ली। ये मजदूर हैं साहब…इन्हें कोरोना से नहीं भूख से डर लगता है।

पिछले दिनों 24 अप्रैल को मुरलीगंज बेंगा पुल पर रात के 8 बजे दिल्ली से 6 मजदूर जन्हें कटिहार जाना था साइकिल से पहुंचे। शक के आधार पर यहाँ के स्थानीय प्रशासन द्वारा उन्हें रोका गया तथा हॉस्पिटल में प्रारंभिक जाँच के बाद उन्हें 14 दिन के लिये कोरेन्टीन सेंटर भेज दिया गया, जबकि सभी स्वस्थ्य थे। वे सभी मजदूर साइकिल से 15 मार्च को ही चला था, पर अफसोस कि साइकिल से भूखे-प्यासे यात्रा करने के बावजूद मात्र 100 किलोमीटर अपने घर अपने परिवार के पास पहुँचने से 14 दिन के लिये वंचित रह जाने की पीड़ा व व्यथा का मूल्यांकन कठिन है।

ये कहानी सिर्फ 6 मजदूरों की नहीं है, बल्कि भारत के लाखों मजदूरों की है। आज भी देश के विभिन्न राज्यों-शहरों में लाखों मजदूर फंसे हुए हैं, भूखे हैं, भयभीत हैं! मजदूरी करके स्वाभिमान के साथ जीने वाले आज लाचार व विवश हैं। जिन मजदूरों के सहारे देश की कृषि एवं सारे उद्योग-धंधे चलते थे, आज वही निःसहाय व भूखा है, जो भारत के भविष्य के लिये चिन्ताजनक है।

आजादी के 7 दशक बीत जाने के बाद भी आज हम कहाँ खड़े हैं, हमारा भारत कहाँ है, क्या भारत विश्व में मजबूत अर्थव्यवस्था या विश्व गुरु बनने का ऐसी व्यवस्था के दम्भ भर पायेगा ? आखिर कब तक नैतिकता व स्वाभिमान से सराबोर मजदूरों-कामगारों का जीवन के अनन्त पथ पर ” भूख और भय का पैदल मार्च जारी रहेगा?

( मजदूर दिवस पर मजदूर भाइयों को सादर समर्पित )

लेखक-अरविंद कुमार (गुरु)


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