कोरोना -लाॅकडाउन -कानून

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कोरोना वायरस (COVID-19) के संक्रमण को भारत में Epidemic Diseases Act,1897 के तहत महामारी घोषित किया गया है । यह एक्ट 1897 में देष में प्लेग के संक्रमण के दौरान महामारी के फैलाव को प्रभावकारी ढंग से रोकने के लिए बनाया गया था । इस अधिनियम में भारत सरकार एवं राज्य सरकार को विषेष उपाय करने का अधिकार दिया गया है । मुख्यतः इस अधिनियम के अन्तर्गत सरकार खतरनाक बीमारी के संक्रमण को रोकने के लिए यात्रा करने वाले लोगों की जाॅंच कर सकती है, तथा संक्रमित या संदिग्ध संक्रमितों को एकान्त स्थिर कर सकती है । भारत सरकार को बाहर से आने वाले यान और पोतों को रोकने का भी अधिकार इस अधिनियम के अन्तर्गत दिया गया है ।

      यद्यपि इस अधिनियम में इस कानून के अन्तर्गत काम करने वाले कर्मियों को संरक्षण दिया गया है किन्तु उल्लंघन पर दंड का अलग से प्रावधान नही है । और इस अधिनियम के अन्तर्गत बनाए गए विनियम या आदेष की अवज्ञा को भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के अन्तर्गत दंडनीय माना गया है ।

      आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 की धारा 2¼d½ में दी गई परिभाषा के अनुसार कोरोना वायरस संक्रमण आपदा की स्थिति है । अतः इस स्थिति से निपटने के लिए आपदा प्रबंधन कानून 2005 के प्रावधानों को भी लागू किया गया है । इसप्रकार कोरोना वायरस ¼COVID-19½ संक्रमण की रोकथाम के लिए Epidemic Diseases Act,1897 तथा डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट 2005 दोनों लागू हैं ।

      डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट 2005 के अध्याय 10 में अपराध एवं दंड के विषय में विस्तृत प्रावधान किये गए है ।

♦ इस अधिनियम की धारा 51 में आपदा/महामारी को रोकने के लिए जारी निर्देषों में व्यवधान उत्पन्न करने या उनका पालन करने से इंकार करने पर दंड का प्रावधान है ।

♦धारा 54 में महामारी के संबंध में असत्य चेतावनी या अफवाह फैलाकर आमजन में भय उत्पन्न करना, इसके लिए भी दंड का प्रावधान है ।

♦ अधिनियम की धारा 52 में सहायता या राहत के झूठे दावे को दंडनीय माना गया है । और धारा-53 में राहत सामग्री /राहत राषि के दुर्विनियोग के लिए दंड का प्रावधान है।

♦ इस अधिनियम में किसी विभाग द्वारा उपरोक्त जैसे अपराध के लिए विभागीय दंड का प्रावधान धारा 55 में किया गया है ।

♦ आपदा के नियंत्रण कार्य में कार्यरत कर्मियों के आपदा प्रबंधन के नियमों या निर्देषों के विपरीत कार्य करने पर धारा -56 में दंड का प्रावधान है ।

♦ इसीप्रकार इस अधिनियम की धारा 57 में धारा 65 के अन्तर्गत जारी अधियाचना का उल्लंघन करने पर दंड का प्रावधान है ।

♦  आपदा प्रबंधन के कार्य में यदि किसी कंपनी या काॅर्पोरेषन द्वारा निर्देषों का उल्लंघन किया जाता है तो उस कंपनी के प्रषासी प्राधिकार, अधिनियम की धारा-58 के तहत दंडित किये  जा सकते है ।

      आपदा एक गंभीर स्थिति है, जो प्राकृतिक या मानवजनित हो सकती है तथा जिससे मानवजीवन या संपति को गंभीर क्षति पहुॅंचने या पर्यावरण की क्षति होने की संभावना होती है। और सामान्य जन व्यवस्था द्वारा इसपर नियंत्रण करना संभव नहीं होता है । इसलिए आपदा प्रबंधन कानून और एपिडेमिक एक्ट में सरकारों को चेकिंग और आइसोलेषन का विषेष अधिकार प्राप्त है ।

      उल्लेखनीय है कि किसी सरकार या सरकार के सक्षम प्राधिकार का आदेष का उल्लंघन भारतीय दंड संहिता की धारा 188 के तहत दंडनीय है । इसके अतिरिक्त भारतीय दंड संहिता की धारा 269 में लापरवाही पूर्वक किसी खतरनाक बिमारी का संक्रमण फैलाना एवं धारा 270 में दुर्भावना से ऐसा संक्रमण फैलाना दंडनीय माना गया है । भारतीय दंड संहिता की धारा 271 में कोरेन्टाइन ;फनंतंदजपदमद्ध नियमों की अवज्ञा के लिए दंड का प्रावधान है ।

जैसा उपर बताया जा चुका है कि एपिडेमिक एक्ट फरवरी 1897 में भारत में प्लेग के संक्रमण की बिमारी के दृष्टिगत पारित किया गया था । संक्रमितों की जाॅच और उनका आइसोलेषन सरकार का विषेषाधिकार है, किन्तु महामारी की विभीषिका को देखते हुए इसे जरूरी माना गया। उल्लेखनीय है कि उस समय भी जाॅंच और कोरेन्टाइन के प्रति कुछ लोगों द्वारा आपŸिा जतायी गयी थी, और इसे ज्यादती कहा गया था । प्लेग के महिला संक्रमितों की जाॅंच पुरूष चिकित्सकों द्वारा करने को लेकर महिलाओं की लज्जाभंग का मुद्दा बनाया गया था । इस मुद्दे को लेकर अप्रैल 1900 में कानपुर में दंगे की स्थिति उत्पन्न हो गयी थी ।

      कानूनों के अनुपालन में लिंग, जाति या वर्ग विभेद के आरोप प्रायः लगाये जाते रहे हंै। 1943 में उ0प्र0 की एक स्वतंत्रता सेनानी प्रेमवती मिश्रा ने पुरूष चिकित्सक द्वारा जाॅंच का विरोध किया गया था । प्लेग के संदिग्धों के रेलवे टिकटों पर निषान लगाया जाना पक्षपात बताते हुए 1902 में उ0प्र0 में काफी विरोध हुआ था तथा इसे बंद करना पड़ा था ।

      वर्तमान परिस्थिति में भी जो विरोध हो रहे है वो कमोवेष इसी ढ़ंग के है । तब पुरूष डाॅक्टरों द्वारा महिला की जाॅंच को स्त्री लज्जा भंग बताया गया था।  अब पुरूष मरीजों द्वारा महिला चिकित्सा कर्मियों के साथ अभद्रता कर स्त्री लज्जा भंग की जा रही है ।

ऐसे विरोध प्रतिरोध नगण्य है । महामारी के स्वरूप और आम जनता के कल्याण को देखते हुए प्रत्येक नागरिक को सरकार द्वारा दिये गए निर्देषों का पालन तथा सक्रिय सहयोग करना चाहिए । तभी हम इस विभीषिका से अपने को और अपने राष्ट्र को बचा सकते है ।

(लेखक:-के0एस0 द्विवेदी, पूर्व पुलिस महानिदेषक, बिहार )


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