पटना : देश की वर्तमान परिस्थिति, समस्या एवं उनके समाधान के विषय पर सेमिनार आयोजन

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प्रेस विज्ञप्ति /

पटना/बिहार : अबुल-कलाम रिसर्च फ़ाउंडेशन पटना द्वारा आयोजित “देश की वर्तमान परिस्थिति: समस्या एवं उनके समाधान ” विषय पर एक सेमिनार कमेटी हाल हारून नगर में आयोजित हुआ। जिसमें पटना और फुलवारी शरीफ़ के बौद्धिक एवं सामाजिक लोगों ने भाग लिया। बड़ी संख्यामें महिलाओं ने भी भाग लिया और क्रूर  कानून सी ए ए, एन आर सी और एन पी आर के खिलाफ अपना विरोध जताया।   

सेमिनार के विशिष्ट अतिथि, प्रसिद्ध पूर्व आई ए एस  हर्ष मंदिर, ने देश को संबोधि करते हुए कहा कि देश ऐतिहासिक दौर से गुजर रहा है, और नया इतिहास बनाने की कगार पर है, ये नई जंग-ए-आज़ादी है। यह युद्ध आर एस एस-विरोधी विचार धारा और सावरकर की दोहरी विचार धारा के विरुद्ध है। महात्मा गांधी अफ़्रीक़ा से जब आए और उन्हों ने स्वतंत्रता युद्ध की क़ियादत की तो एक सवाल पैदा हुआ कि अंग्रेज़ों से आज़ादी के बाद भारत की सूरत कैसी होगी, देश का ढांचा किस तरह का होगा, उसकी बुनियाद धर्म होगा या धर्मनिरपेक्षता। आरएसएस शुरू से ये कोशिश करती रही है कि भारत को हिंदू राष्ट्र बनाया जाये। इसीलिए गोडसे ने गांधी की हत्या की। लेकिन नेताओं को विश्वास था कि हमारा देश एक धर्म निरपेक्ष देश होगा, जहाँ हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई अमन व शान्तिएवं इत्तिहाद के साथ ज़िंदगी गुज़ारेंगे । उन्होंने कहा कि मौलाना आज़ाद ने कहा था कि हिंदू मुस्लिम इत्तिहाद की क़ीमत पर मुझे देश की आज़ादी मंज़ूर नहीं है, ज़रूरत इस बात की है कि देश में नफ़रत की आग को मुहब्बत की बारिश से बुझाया जाये । आरएसएस देश को तोड़ने की कोशिश कर रहा है और हम उस की अखंडता के लिए जद्दो जिहद करने में लगे हैं। उन्होंने कहा कि सीएए देश की अखंडता और हिंदू मुस्लिम, सिख, ईसाई इत्तिहाद को ख़त्म करने वाला है।

      ऑल इंडिया मिल्ली कौंसल के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मौलाना अनीसुर रहमान क़ासिमी चेयरमैन अबुल-कलाम रिसर्च फ़ाउंडेशन, पटना ने अपने अध्यक्षीय भाषण कहा कि देश का एक बड़ा प्रोब्लम संविधान की आत्मा और बुनियादी ढाँचे को ख़त्म करने की कोशिश है, जो विगत छः वर्षों से की जा रही है और कई अधिनियम बनाए जा चुके हैं। इनमें से सबसे महत्वपूर्ण है नागरिकता का वर्तमान संशोधन कानून, जो धर्म के आधार पर धर्म की सबसे खतरनाक विधितय करता है । इसलिए इस क़ानून की वापसी ज़रूरी है, इसलिए,  इस कानून  की वापसी आवश्यक है, साथ ही एन पी आर की वापसी भीज़रूरी है, यह एन आर सी का पहला कदम है।

      राष्ट्रीय परिस्थितियों की गंभीरता के विरोध में इस्तीफा देने वाले आईएएस कन्नन गोपी नाथन ने सेमिनार को संबोधित करते हुए अपने सुंदर सवालिया अन्दाज में लोगों से पूछा कि आप सी ए ए का क्यों विरोध कर रहे हैं, जबकि प्रधानमंत्री कहते हैं किकानू नागरिकता देताहै, नागरिकता लेता नहीं,  उन्होंने पूरी वज़ाहत के साथ ये बतलाया कि ये कानून केवल भारत के संविधान के खिलाफ नहीं है, बल्कि मानवीय और संवैधानिक मूल्यों के भी खिलाफ है। उन्हों ने स्पष्ट रूप से कहा कि सरकार   जिस कारण का वर्णन कर रही है वह बहुत ही त्रुटिपूर्ण, तर्कहीन और समझ से बाहर है। उन्होंने कहा कि सरकार कि बातों में खुला विरोधा भास है, न्होंने कहा कि आख़िर किस बुनियाद पर इन 6धर्मों को ही इस क़ानून में शामिल किया और मुस्लमानों को इस से अलग रखा गया, उस की कोई वजह आज तक सरकार बताने में नाकाम है, इसी तरह सिर्फ तीन देश के प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को ही शामिल किया गया, ये भी सरकार नहीं बता सकी। आख़िर श्रीलंका तमिल, मयांमार के मुस्लिम और यहूदीयों, और उन लोगों को क्यों नहीं शामिल किया गया, जो किसी धर्म पर यक़ीन नहीं रखते हैं, उन्होंने कहा कि हुकूमत के लोग नफ़रत फैला रहे हैं, लेकिन हम भारत के लोगों ने तय किया है कि हम नफ़रत के लिए एक इंच जगह भी नहीं छोड़ेंगे।

      सेमिनार को संबोधित करते हुए पूर्व आई पी ऐस अमिताभ कुमार दास ने कहा कि मैं आपकी लड़ाई अपनी लड़ाई समझ कर लड़ता रहूँगा, भारत का संविधान सैकूलर है, और इस देश में कोई भी क़ानून धर्म की बुनियाद पर नहीं बनाया जा सकता है। मोदी और अमित शाह हिन्दुस्तानी संविधान को ख़त्म करके यहां संघी एवं आर एस एस के मनु स्मृति का क़ानून लागू करना चाहते हैं।जबकि पूर्व आई पी ऐस मुहम्मद शुऐब ख़ां ने कहा कि बुद्धि और चेतना मनुष्य के लिए बहुत बड़ा धन है और कि जो लोग बौद्धिक रूप से जागरूक हैं, वे कभी भी इस विभाजन को स्वीकार नहीं करेंगे। इस समेनार से एहतिशाम कुटौनी और कीरती ने भी संबोधित किया।  


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