जल जीवन हरियाली”आधारित सरकार प्रायोजित मानव श्रृंख्ला  : सफल या असफल?

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मंजर आलम

       निरंतर बढ़ता प्रदूषण, घटता जल स्तर, सड़क, गली मुहल्ले में उठता पॉलिथीन का बबंडर, उजड़ते हरित जंगल,औद्योगिकीकरण और  बढ़ते ग्रीन हाउस गैस के प्रभाव के फलस्वरूप ग्लोबल वॉर्मिंग। आखिर कब तक हम पृथ्वी के साथ खिलवाड़ करते रहेंगे। क्या हम आने वाली पीढ़ी को ऐसा भविष्य देना चाहते हैं जहाँ सांस लेने को शुद्ध हवा न हो, पीने को पानी न हो और छांव के लिए पेड़ न हो? निःसंदेह पर्यावरण संरक्षण के मद्देनजर पेड़ की अहमियत अपनी जगह कायम है। पेड़ न सिर्फ इंसान को आक्सीजन रूपी जीवनदायनी गैस प्रदान करता है, अपितु मानव जीवन के कई अहम जरूरतों को पूरा भी करता है। जीव जंतुओं पशुओं और चहचहाते पक्षियों को आहार और आश्रय भी प्रदान करता है।

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          आश्चर्यजनक है कि धरातल पर तीन चौथाई पानी होने के बावजूद भी पीने योग्य जल की मात्रा सीमित है। समुद्र का खारा जल पीने योग्य नहीं होता। विडम्बना है कि पीने के लायक जल की मात्रा कम होने के बाद भी इसका अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। नदियों, तालाबों कुओं को हम दूषित होने से बचा नहीं पा रहे हैं।तेजी से शहरीकरण की ओर अग्रसर हो रहे हमारे देश में अधिक सक्षम प्रबंधन और समुन्नत पेयजल आपूर्ति की नितांत आवश्यकता पड़ेगी। हमारे देश में दुनिया की लगभग सोलह प्रतिशत आबादी निवास करती है परंतु चार प्रतिशत पानी ही उपलब्ध है।ऐसे में बारिश की एक एक बूँद हमारे लिए कीमती है और इसे सहेजना जरूरी है। 

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           जल जीवन हरियालीबिहार सरकार की ऐसी ही एक महत्वाकांक्षी योजना है जिसका उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है । जल जीवन हरियाली योजना को लागू करने के लिए सरकारी पोखर,तालाबों को अतिक्रमण मुक्त करवाया जा रहा है जहाँ जल संरक्षण को बढ़ावा दिया जाएगा। बाँधों और सड़कों के किनारे सरकारी जमीन पर पेड़ लगाए जाएंगे। वर्षाजल के संचयन के लिए हार्वेस्टिंग सिस्टम बनाए जाएँगे। बैट्री चालित गाड़ियों को बढ़ावा दिया जाएगा। ऐसे कई अहम फैसले लिए जा रहे हैं।निश्चय ही योजना को अपने लक्ष्य तक पहूँचाने में जहाँ सरकारी प्रयास महत्वपूर्ण है वहीं आमजनों का भरपुर सहयोग भी अपेक्षित है।जब तक जन जन की भागीदारी सुनिश्चित नहीं होगी तब तक सरकार अपने मिशन में कामयाब नहीं हो पाएगी। 

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           पोखर तालाबों को अतिक्रमण मुक्त कराने के कारण बहुत से लोगों को विस्थापन का दर्द भी झेलना पड़ा है। सरकार के आदेश से उन्हें अपने घरों को हटाना पड़ा है जिसके तहत भूमिहीन लोगों के सामने एक विपदा आ पड़ी है।कड़ाके की इस ठंड ने उसकी मुश्किलें और भी बढ़ा दी हैं। विचारणीय है कि ऐसे पीड़ित परिवार के लिए सरकार तत्काल क्या सुविधा देगी?

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        यद्यपि सरकार ने जनभागीदारी को सुनिश्चित करने के लिए जन जागरूकता के प्रयासों के तहत 19जनवरी को प्रदेश स्तरीय मानव श्रृंख्ला का आयोजन करवाया। इसके लिए व्यापक पैमाने पर प्रयत्न किए गए। स्कूली बच्चों, शिक्षा स्वयंसेवकों जन वितरण प्रणाली के डीलर्स, आँगनबाड़ी, जीविका कर्मियों जनप्रतिनिधियों आदि सबकी मदद ली गई। सरकारी दावे कहते हैं कि यह मानवश्रृंख्ला अपने पुराने सारे रिकार्ड को तोड़ दिया है जो गत वर्ष शराबबंदी के पक्ष में और बाल विवाह व दहेज प्रथा के विरुद्ध बनाए गए थे। 

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           सरकारी दावों से इतर कुछ और ही दावे हैं। आँकड़े बताते हैं कि सरकार प्रायोजित इस प्रदेश स्तरीय मानव श्रृंख्ला के प्रति इस बार जनता में उत्साह की कमी साफ झलक रही थी। जनता का स्पष्ट मानना है कि इस तरह के आयोजन सिर्फ दिखावे के लिए होते हैं जमीन पर इसके असर दिखाई नहीं पड़ते। शिक्षकों के संगठनों ने सरकार को साफ साफ बता दिया था कि वह उनके इस मानवश्रृंख्ला का खुलकर बहिष्कार करते हैं क्योंकि “समान काम के लिए समान वेतन” के मुद्दे पर सरकार ने शिक्षकों की एक न सुनी इतना ही नहीं माननीय सुप्रीम कोर्ट में शिक्षकों के विरुद्ध एक मजबुत विपक्ष की भूमिका भी निभाई थी। भला ऐसे में वह सरकार के हर आह्वान पर क्यों खड़ा हो? शिक्षकों के बहिष्कार का असर यह रहा कि सरकारी स्कूलों के बच्चों की उपस्थिति आशा अनुरूप नहीं रही हालांकि प्राईवेट स्कूलों के छात्र छात्राओं ने अपनी उपस्थिति जरूर दर्ज कराई। शराबबंदी के मुद्दे पर नीतीश कुमार की नेतृत्व वाली महागठबंधन की सरकार के समय जब मानवश्रृंख्ला का आयोजन किया गया था तो प्रदेश की सभी राजनीतिक दलों का व्यापक समर्थन प्राप्त था परंतु लगभग इस बार ऐसा नहीं देखा गया।हालांकि जल जीवन हरियाली एक ऐसा मुद्दा है जिसके समर्थन में सबलोग हैं परंतु लोगों का मानना है कि इसके लिए सर्द भरी हवाओं में सड़कों पर खड़ा होना आवश्यक नहीं ब्लकि अपने घरों, स्कूलों दफ्तरों में पौधे लगाए जाएँ और कुछ लोगों ने तो वृक्षारोपण भी किया। 

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                ऐसे समय जबकि देशभर में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), एनआरसी और एनपीआर के विरुद्ध एक देशव्यापी जन आंदोलन चल रहा है,उसकी गूँज इस मानवश्रृंख्ला में भी देखने को मिली। लोगों ने जहाँ सरकार के इस जनहितैषी मुद्दे “जल जीवन हरियाली” पर अपनी सहमति जताई वहीं सीएए, एनपीआर,एनआरसी के विरुद्ध अपनी आपत्ति भी प्रमुखता से दर्ज कराया। नो सीएए, नो एनपीआर,नो एनआरसी के प्लेकार्ड तथा बैनर के माध्यम से युवाओं और महिलाओं ने सरकार को यह संदेश देने का प्रयास किया कि वह जहाँ बिहार सरकार के हर नेक काम के साथ मजबुती से खड़े हैं वहीं वह बिहार सरकार के उस निर्णय के विरुद्ध हैं जिसमें उन्होंने  सीएए का समर्थन किया है और एनपीआर   करवाने की घोषणा कर चूके हैं।कुछ जगहों पर युवा #रोजगार दो और #बेरोजगारी के प्लेकार्ड भी दिखा रहे थे।

                निःसंदेह प्रदेश में बदहाल शिक्षा व्यवस्था, बेरोजगारी, महंगाई जैसे मुद्दे भी हैं और आमजन इन मुद्दों पर सरकार की उदासीनता से परेशान भी हैं।भला ऐसे में लोगों के जीवन में हरियाली कैसी आएगी? मानवश्रृंख्ला के दौरान आमजनों ने जो भावनाएँ प्रकट की हैं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को उसे गंभीरता से लेना चाहिए। मानवश्रृंख्ला सिर्फ एक ईवेंट बनकर न रह जाए ब्लकि योजनाएँ जमीनी स्तर पर परिलक्षित हों तभी सरकार प्रदेश की जनता का विश्वास जीत सकती है। 

✒मंजर आलम (स्वतंत्र टिप्पणीकार)


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