शुक्रिया वशिष्ठ : एक अभियान जो बनेगा आंदोलन

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अनूप ना. सिंह
स्थानीय संपादक

पटना/बिहार : हाल ही में गणितज्ञ आनंद कुमार के जीवन पर आधारित फिल्म सुपर थर्टी ने पूरी दुनिया में धूम मचा दी है इस फिल्म में बिहार के युवाओं के जीवन का संघर्ष को काफी संजीदगी से दिखाया गया है,आज हम आपको एक ऐसे बिहारी गणितज्ञ से मिलवाने जा रहे हैं जो आज गुमनामी भरी जिंदगी जी रहे है पर उनकी प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया आज भी मानती है, बिहार के गुमनाम एक ऐसी शख्सियत को फिर से पुनर्जीवित करने का प्रयास है

शुक्रिया वशिष्ठ जिसे पूरी दुनिया महान गणितज्ञ के रूप में जानती हो सरकारी मिशनरियों के ढुलमुल रवैए का शिकार दुनिया का यह नयाब कोहिनुर एक बार फिर चर्चा में है, बिहार के कुछ युवाओं ने इन्हें लेकर शुक्रिया वशिष्ठ नामक अभियान की शुरुआत की है जो बिहार के घर घर में छुपे हुए प्रतिभाओं से निकालेंगे। पटना ग्रीन हाउस ऑफ प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक भूषण कुमार सिंह इस अभियान के प्रणेता बने है। वशिष्ठ नारायण सिंह के भतीजे मुकेश कुमार सिंह इस अभियान के संयोजक है

शुक्रिया विशिष्ट के तहत 50 मेधावी बच्चों का बिहार से चयन कर उनके लिए निशुल्क आवास भोजन व कोचिंग की व्यवस्था की जाएगी यहां इंजीनियरिंग और मेडिकल की तैयारी कराई जाएगी, अपाचे आशियाना नगर राम नगरी मोर अभियंता नगर में संस्थान की नींव रखी गई है, जहां आज इसकी विधिवत पूजा हुई जिसमें बतौर अतिथि अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा बिहार प्रदेश के अध्यक्ष डॉ विजय राज सिंह, बनियापुर विधानसभा से कांग्रेस के पूर्व प्रत्याशी शैलेश कुमार सिंह, पत्रकार अनूप नारायण सिंह, समाजसेवी रजनीश राजपूत समेत कई गणमान्य जन उपस्थित थे।

एक शख्स जिसे दुनिया ने भूला दिया खुद के होने की निशानी तलाश रहा है। मैं बात कर रहान हूं महान मैथमैटिशन #डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह की जो आज कहां है इसकी खुद। उन्हें भी खबर नहीं है। 40 साल से भी ज्यादा समय से ये महान मैथमैटिशन मानसिक बीमारी सिज़ोफ्रेनिया से पीड़ित हैं। मैथ के फॉर्मूलों को हल करते-करते वशिष्ठ नारायण को पता ही नहीं चला कि कब वो बीमारी की इक्वेशन की गिरफ्त में आ गए। बेहद चुप रहने वाले वशिष्ठ नारायण ज़रूरत पड़ने पर ही अल्फाज़ों की तिजोरी को खोलते हैं। आजकल पटना के गांधी मैदान के सामने कहीं रहते हैं, सरकार को तो उनका पता नहीं मालूम, लेकिन कुछ दोस्त हैं, जो आज भी हाल-चाल लेने पहुंच जाते हैं।
अयोध्या सिंह रिश्ते में उनसे छोटे हैं, लेकिन अपनी पेंशन के बल पर जितना ख्याल रख सकते हैं, बड़े भाई की तरह रखते हैं, जब मेरी उनसे बातचीत हुई तो बहुत ही प्यार से बोले ‘’ठीक हैं भईया हम खुश हैं कि पहले से बेहतर हैं, वशिष्ठ नारायण अपनी ही दुनिया में गुम रहते हैं। आज भी दिन में 16-17 घंटे पढ़ते हैं। हाथ में कलम लेकर पूरे घर में घूमते रहते हैं और जब लिखना होता है, तो ये नहीं देखते कहां लिख रहे हैं, फिर वो किताब हो दीवार हो या फिर कुछ भी, दिमाग में चल रही उथल-पुथल को बयां कर देते हैं, और अक्सर क़लम लेकर ही सो जाते हैं’’।
आरा के बसंतपुर के रहने वाले वशिष्ठ नारायण सिंह बचपन से ही होनहार थे, खुदा ने कुछ खास तरह के ज़ेहन से नवाजा था, सबके बारे में नहीं कह सकती, लेकिन हां ज्यादातर लोगों के लिए मैथ मतलब ‘’हमसे ना हो पाएगा’’ वाली चीज़ समझी जाती है, लेकिन जिनको मैथ से प्यार हो जाता है, वो तो चलते फिरते आंखों के सामने इनविज़बल एक बोर्ड लगाए रहते हैं और उसी पर सवालों को हल करते रहते हैं। जैसे-जैसे मैं इस शख्स के बारे में जानकारी हासिल कर रही थी आंखों के सामने महान गणितज्ञ जॉन नैश की कहानी आ रही थी जिसे बहुत ही खूबसूरती के साथ Russell Crowe ने ‘’ए ब्यूटिफूल मांइड’’ फिल्म में पेश कर ऑस्कर जीता। दोनों के ही जीवन में बहुत सी समानताएं हैं, लेकिन बावजूद बहुत से अंतर भी हैं।
डॉ वशिष्ठ बचपन से ही बहुत होनहार रहे उनके बारे में जिसने भी जाना हैरत में पड़ गया। छठी क्लास में नेतरहाट के एक स्कूल में कदम रखा, तो फिर पलट कर नहीं देखा एक गरीब घर का लड़का हर क्लास में कामयाबी की नई इबारत लिख रहा था। वे पटना साइंस कॉलेज में पढ़ रहे थे कि तभी किस्मत चमकी और कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर जॉन कैली की नजर उन पर पड़ी जिसके बाद वशिष्ठ नारायण 1965 में अमेरिका चले गए और वहीं से 1969 में उन्होंने PHD की।
वशिष्ठ नारायण ने ‘साइकिल वेक्टर स्पेस थ्योरी पर शोध किया जिसके बारे में मैंने मैथ से जुड़े लोगों से बात की, लेकिन ईमानदारी से बता रही हूं कि कुछ पल्ले नहीं पड़ा, लेकिन उन लोगों के मुताबिक शोध बहुत ही शानदार है। यकीनन वक्त वशिष्ठ नारायण के साथ था कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी, बर्कले में एसिसटेंड प्रोफेसर की नौकरी मिली। उन्‍हें नासा में भी काम करने का मौका मिला, यहां भी वशिष्ठ नारायण की काबिलयत ने लोगों को हैरान कर दिया। बताया जाता है कि अपोलो की लॉन्चिंग के वक्त अचानक कम्यूपटर्स से काम करना बंद कर दिया, तो वशिष्ठ नारायण ने कैलकुलेशन शुरू कर दिया, जिसे बाद में सही माना गया।
बहरहाल, जैसा की अक्सर होता है लोग विदेश जाते हैं तो वहीं के होकर रह जाते हैं, लेकिन वशिष्ठ नारायण पिता के फरमाबरदार बेटे थे। पिता के कहने पर विदेश छोड़कर देश लौट आए पिता के ही कहने पर शादी भी कर ली, लेकिन किस्मत को कुछ और मंजूर था 1973-74 में उनकी तबीयत बिगड़ी और पता चला की उन्हें सिज़ोफ्रेनिया है, जिस पत्नी ने सात जन्म साथ निभाने की क़सम खाई थी वो पति की बीमारी की वजह से एक जन्म भी साथ ना चल पाई।
1976 में उन्हें रांची में भर्ती करवाया गया उसके बाद भी कई जगह उन्हें दिखाया गया, लेकिन परिवार वालों पर ग़म का पहाड़ उस वक्त टूटा जब इलाज के सिलसिले में बाहर गए वशिष्ठ नारायण घर लौट रहे थे कि रात के अंधेर में ट्रेन से उतरे और जाने कहां गुम हो गए। करीब 5 साल बाद शादी में गए गांव के कुछ लड़कों ने उन्हें सारण में देखा। वो बेहद दयनीय हालत में थे, पर आज वो पहले से बेहतर हैं इसलिए परिवार वालों को उम्मीद है कि एक दिन वो बिल्कुल ठीक हो जाएंगे।


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