मधेपुरा : नशे के चंगुल में बुरी तरह फंस रहे हैं मधेपुरा के युवा, देश का भविष्य खतरे में, कारगार कदम उठाने की सख्त जरुरत

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अमित कुमार
उप संपादक

मधेपुरा/बिहार : शराबबंदी के बाद शहर में युवा पीढ़ी में सस्ते नशे की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं। शहर में अधिकतर युवा सनफिक्स व व्हाइटनर के नशे की आदि बन चुके हैं। वहीं बीएनमंडल स्टेडिम इन युवाओं को नशे के लिए काफी सुरक्षित स्थान भी साबित हो रहा है।

ये सारी सच्चाई तब सामने आई जब एक युवक को व्हाइटनर का सेवन करते देखा गया। जब युवक से बात की गई तो युवक का कहना था कि उसे व्हाइटनर की आदत हो चुकी है, उसे हर रोज़ इसकी जरूरत है। मेडिकल दुकानों में बिना डाक्टर के पर्ची के नशे की दवाइयां व इंजेक्शन नही मिलने के कारण नशेड़ी युवा व मासूमों ने व्हाइटनर, सनफिक्स को अपना प्रिय नशा बना लिया है।

फ़ाइल फोटो

सनफिक्स एक तरीके का गोंद है। इससे प्लास्टिक का सामान, कागज व करंसी नोट, जूते-चप्पल व अन्य कई घरेलू सामानों के टूटने या फटने पर उन्हें मरम्मत कर उपयोग के लायक बनाया जाता है। व्हाइटनर एक तरह का इरेज़र है जिसका उपयोग हैंडराइटिंग को मिटाने के लिए किया जाता है। यह मुख्यत: पान की दुकान, जनरल स्टोर व किताब की दुकानों पर कम दामों में आसानी से मिल जाता है। इसका उपयोग युवा वर्ग व मासूम प्लास्टिक पर उड़ेलकर दोनो हाथों से उसे उठाकर नाक के सामने लाकर उसे सूंघकर करते हैं।
युवा व किशोर हो रहे हैं इस लत के शिकार
शराबबंदी के बाद नशे का तरीका बदल गया है। शराब नहीं मिलने के चलते अब विकल्प निकालने में लगे हुए हैं। इसके लिए अब व्हाइटनर, सनफिक्स का उपयोग कर रहे हैं। इसके सबसे अधिक शिकार युवा व किशोर हो रहे हैं। रूमाल या छोटे कपड़े में थीनर, व्हाइटनर को डाल कर उपयोग करने के चलते कई युवकों व खास कर किशोरों के परिजन परेशान हैं। जिले के चौक-चौराहों पर युवाओं के साथ ही छोटे-छोटे बच्चे नशा के दूसरे साधन सनफिक्स, सुलेशन, व्हाइटनर का जमकर इस्तेमाल कर रहे। शहर का हाल यह है कि युवाओं की अपेक्षा छोटे-छोटे बच्चे इसके सेवन कर रहे हैं। नशा के खतरनाक साधन का उपयोग बच्चे व युवा नशा के इतने गिरफ्त में चले जा रहे कि वे शराब गांजा, भांग के बदले अब पन्नी में सुलेशन व सनफिक्स गम लेकर पंपिंग करते हुए नशा का सेवन कर रहे हैं। रुमाल या छोटे कपड़े में व्हाइटनर को डाल कर उपयोग किया जा रहा।

फ़ाइल फोटो

नशे की लत के कारण आपराधिक मामलों में नाबालिगों की संलिप्तता  
शराब से कहीं ज्यादा घातक इस नशीले पदार्थ की लत के जद में आ चुके कई किशोर या युवा चलते-फिरते आपको सड़कों पर आराम से मिल जायेंगे। और तो और इसी वजह से आपराधिक मामलों में नाबालिगों की संलिप्तता बढ़ती जा रही है। ऐसा कोई जुर्म नहीं है, जिसमें नाबालिग शामिल न हो। मोबाइल चोरी व छिनतई से लेकर दुष्कर्म और हत्या जैसे संगीन मामलों में भी नाबालिगों की बढ़ती तादाद सभी के लिए चिंताजनक है। नाबालिगों का आपराधिक घटनाओं में संलिप्त होना बेहद गंभीर मसला है। पारिवारिक व सामाजिक बदलाव का असर बच्चे के नाजुक दिलों-दिमाग पर भी हो रहा है। परिवार में उचित देखभाल की कमी एवं नैतिक शिक्षा नहीं मिलने से बच्चे नशा व अपराध की ओर कदम बढ़ा रहे हैं, जिसके चलते नाबालिगों में आक्रामकता की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ती जा रही है।  यही कारण है कि अभिभावकों, मनोवैज्ञानिकों व समाजशास्त्रियों के लिए यह मुद्दा चिंता का विषय बन गया है।

बाल अपराधियों की संख्या में जबरदस्त वृद्धि के आंकड़े किसी भी सभ्य समाज के लिए शुभ संकेत नहीं हैं, जिनके कंधों पर देश की बागडोर टिकी है, उनका आपराधिक वारदात में संलिप्त होना एक गंभीर मामला है। ऐसे में अभिभावकों व परिजनों की जिम्मेवारी बढ़ जाती है। बच्चों के रहन-सहन एवं उनके मित्रों के संबंध में जानकारी रखना जरूरी है।

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व्हाइटनर उपयोग करने वालों का स्टेडियम बना सुरक्षित जोन 
युवक ने बताया कि स्टेडिम इसके लिए काफी सुरक्षित स्थान है। यहां कोई देखता नही है। साथ ही यह नशा बिना किसी डर के बाजार में आसानी से सस्ते दाम में मिल जाता है। बता दें कि शहर में स्टेडियम, स्टेशन, सहित ऐसी कई जगह है, जो सनफिक्स, व्हाइटनर व अन्य केमिकल नशे को लेकर युवाओं के लिए सुरक्षित स्थान साबित हो रहा। स्टेशन के पीछे, कॉलेज चौक गोलंबर के समीप, बीपी मंडल अभियंत्रण महाविद्यालय के परिसर सहित कई जगहों पर कोरेक्स की खाली बोतलें काफी देखी जा रही है। कई जगहों पर बोतलों की ढेर लगी हुई है। व्हाइटनर का ज्यादा सेवन सीधे दिमाग पर अटैक करता है, जिससे दिमाग की नसें सूखने लगती हैं और सोचने की क्षमता कम होती जाती है। व्हाइटनर के लगातार इस्तेमाल से कंफूयज होना, याद्दाश्त का कमजोर होना, लीवर में गड़बड़ी और पेट व सीने में दर्द जैसी समस्या पैदा होती है।
आमलोगों के लिए पान मसाला की तरह हमारे लिए व्हाइटनर जरूरी  
सवाल- क्या पी रहे थे?
जवाब- व्हाइटनर, जो लिखे हुए को मिटाने में इस्तेमाल किया जाता है।
सवाल- कैसे पीते हो?
जवाब-लिफाफे में भरकर सूंघता हुं।
सवाल-इससे नशा लगता है?
जवाब- हां हल्का नशा जैसे पेट्रोल को सूंघने पर लगता है।
सवाल- क्यों पीते हो?
जवाब- जैसे सभी को पान खाने की आदत होती है, ठीक वैसे ही दिन में एक बार पीता हूं।
सवाल- कहां और कितने में मिलता है?
जवाब- किताब दुकानों में 15-20 रुपए लगते है।
सवाल- यहीं क्यों आते हो?
जवाब- बाजार में पीने से लोगों के कहने का डर रहता है, लेकिन स्टेडियम सुरक्षित और सही स्थान है।
शरीर होता है इनफैक्टेड, चिड़चिड़ा बन जाता है व्यवहार : युवाओ में सनफिक्स व व्हाइटनर से नशे के बढ़ते क्रेज को देखते हुए डा यश शर्मा ने बताया कि सनफिक्स व व्हाइटनर के इस्तेमाल से मनुष्य ड्रग एडिक्ट हो जाता है। उसके सोचने समझने की शक्ति क्षीण हो जाती है। आम लोगों के साथ उसके व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है। शरीर का इम्यून सिस्टम खराब होने के साथ लीवर व फेफड़ा को नुकसान पहुंचता है। इसके सेवन से पूरे शरीर में इंफेक्शन हो सकता है। बाद में न्यूमोनिया, टीबी के लक्षण भी देखने को मिलता है। नशा अपराध की दुनिया में प्रवेश कराने में भी काफी मदद करती है। जिसके कारण लोग अपने आप पर नियंत्रण नहीं रख पाते हैं और व्यक्तियों से र्दुव्‍यवहार करने को उतारू हो जाते हैं। यही कारण है कि हमारे समाज में बच्चों के साथ र्दुव्‍यवहार, बलात्कार, घरेलू हिंसा, महिलाओं को प्रताड़ना आम बात हो गयी है। डा यश शर्मा ने बताया कि बच्चे को जिस सांचे में ढाला जाता है बच्चे उसी के अनुकूल ढल जाते हैं। लेकिन जब बड़े ही नशा का सेवन करेंगे तो छोटे-छोटे बच्चे पर क्या असर पड़ेगा। इसलिए बड़े को चाहिए कि वे बच्चों को देखें तो तंबाकू व शराब के सेवन करने से परहेज करें। यदि वे किसी बच्चे को गलत लत करते देखे तो उसे सही रास्ते की ओर जाने के लिए प्रेरित करें।
क्या कहते हैं पदाधिकारी
सदर एसडीपीओ, मधेपुरा वसी अहमद, ने बताया कि ऐसी सूचना मिली है कि युवा वर्ग सनफिक्स का सेवन कर रहे हैं। युवा हमारे देश के भविष्य हैं। मामले को गंभीरता से ली जा रही है। स्टेडियम, पार्क सहित सभी चिन्हित स्थानों पर गश्ती बढ़ा दी गई है।