नालंदा : उर्दू बिहार सरकार की दूसरी मातृभाषा होने के बावजूद सौतेला पन, उर्दू के प्रति हमदर्दी सिर्फ दिखवा?

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मो0 मुर्शीद आलम
ब्यूरो, नालंदा

नालंदा/बिहार : बिहार सरकार उर्दू मातृभाषा की विकास करने के बजाय आज इस भाषा के साथ सरकार सौतेला पन रवैया अख्तियार किए हुए हैं आखिर ऐसा क्यों।

उर्दू मातृभाषा को बिहार में दुसरी दर्जा प्राप्त किए हुए 38 साल बीत चुके हैं फिर भी उर्दू मातृभाषा के साथ सरकार हर जगह सौतेला पन सलूक कर रही है। जब बिहार सरकार के द्वारा उर्दू को सरकारी दूसरी मातृभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ तो यह आदेश दिया गया कि बिहार सरकार के सभी कार्यालयों में और सभी सरकारी जगहों पर हिंदी के साथ साथ उर्दू का भी लिखना अनिवार्य होगा, लेकिन आज देखे तो नीतीश कुमार के गृह जिले में उर्दू का बहुत ही बुरा हाल है।  सभी सरकारी कार्यालयों में हिंदी के साथ उर्दू का नामोनिशान नहीं है, कुछ कार्यालयों में हिंदी के साथ उर्दू लिखा हुआ है।  लेकिन बहुत सारे कार्यालय और थानो कई स्कूल बोर्ड में उर्दू गायब है, इस तरह उर्दू के साथ नाइंसाफी बिहार सरकार के द्वारा की जा रही है।

जिले में 20 प्रखंड और 30 थाना है जब के कई थानों के बोर्ड में हिंदी के साथ उर्दू नहीं दर्शाया गया है कुछ जगह पर दर्शाया भी गया है वह तोड़ मरोड़ कर उर्दू भाषा लिखा हुआ है। कुछ दिन पहले बिहार शरीफ रेलवे स्टेशन के बिल्डिंग में उर्दू मातृभाषा नहीं दर्शाने पर एक संगठन के द्वारा प्रदर्शन भी स्टेशन पर किया गया था जिसके बाद से यह आश्वासन मिला कि आब सभी जगहों पर उर्दू के भाषा का प्रयोग किया जाएगा । लेकिन आज भी बिहार सरकार के कई कार्यालय और थानों के बोर्ड में उर्दू नहीं दर्शाया गया। इस तरह से यह साफ दिखाई देता है कि 38 साल पहले बिहार सरकार के द्वारा उर्दू मातृभाषा को बिहार की दूसरी भाषा का जो दर्जा दिया गया था उस पर आज सरकार बिल्कुल निष्क्रिय हो गई है और कोई ध्यान उर्दू मातृभाषा पर नहीं दिया जा रहा है इस तरह उर्दू मातृभाषा के लोगों के भावनाओं से खिलवाड़ किया जा रहा है।


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