बैंक शिक्षा ऋण से भी ज्यादा मुश्किल हुआ बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड ऋण, मूल उद्देश्य से भटक गई योजना : धनंजय

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अनूप ना. सिंह
स्थानीय संपादक

पटना/बिहार  : शिक्षा प्रचार समिति के अध्यक्ष धनंजय कुमार सिन्हा ने दुख व्यक्त करते हुये कहा कि बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना अपने मूल उद्देश्य से भटक गई है। उन्होंने कहा कि इसकी शुरूआत उच्च शिक्षा के लिये आसानी से ऋण उपलब्ध कराने के उद्देश्य से की गई थी। किन्तु अब इस योजना से शिक्षा ऋण प्राप्त करना बैंकों से शिक्षा ऋण प्राप्त करने से भी ज्यादा मुश्किल हो गया है।

धनंजय ने कहा कि अगर अखबारों में छपी खबर सच भी है कि योजना में 3 करोड़ रूपये का घोटाला हुआ तो राज्य सरकार को उस घोटाले पर कार्रवाई करनी चाहिये थी, न कि योजना को सीमित किया जाना था।

       धनंजय ने बताया कि शिक्षा ऋण के संदर्भ में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने सभी बैंकों को गाइडलाइन जारी कर रखा है कि केन्द्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय के नियमों के अनुसार जो भी सरकारी या निजी विश्वविद्यालय-कॉलेज देश भर में संचालित किये जा रहे हैं, उनमें पढ़ने के लिये छात्र-छात्राओं को बिना किसी सिक्युरिटी डिपॉजिट के चार लाख तक का लोन उपलब्ध कराये। रिजर्व बैंक के गाइडलाइन के बावजूद कई बार कई बैंक गरीब परिवार के बच्चों को ऋण देने में आनाकानी करते थे। इसकी शिकायत राज्य सरकार के प्रतिनिधियों तक भी पहुँचती रहती थी। तब जाकर राज्य सरकार ने बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना की शुरूआत की जिसके अंतर्गत राज्य के सभी छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा के लिये चार लाख तक का लोन बिना किसी सिक्युरिटी के राज्य सरकार की गारंटी पर दिया जाने लगा। इस योजना के तहत राज्य सरकार ने वर्ष 2019-20 के लिये न्यूनतम 75 हजार छात्र-छात्राओं को शिक्षा-ऋण उपलब्ध कराने का लक्ष्य रखा था।

किन्तु अब घोटाला का हवाला देते हुये योजना के नियमों में कुछ ऐसे परिवर्तन कर दिये गये जिससे कि अब बहुत ही कम संख्या में छात्र-छात्रायें इस योजना के तहत शिक्षा-ऋण ले पायेंगे। शिक्षा प्रचार समिति के अध्यक्ष धनंजय ने कहा कि इस योजना के शुरू होने के बाद गरीब छात्र-छात्राओं एवं उनके अभिभावकों में जो उम्मीदें जगी थीं वे चकनाचूर हो गईं। धनंजय ने कहा कि घोटाले का निदान जाँच एवं कार्रवाई होनी चाहिये थी, योजना को मिनिमाइज नहीं करना चाहिये था। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि घोटाले की आड़ में योजना को मिनिमाइज करना ही विभाग का मुख्य उद्देश्य था, अन्यथा योजना को बिना मिनिमाइज किये हुये भी घोटाले की जाँच एवं कार्रवाई संभव थी।

विदित हो कि बिहार सरकार ने विगत 5 जुलाई 2019 को एक पत्र निर्गत कर बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड योजना में यह संशोधन कर दिया कि अब राज्य से बाहर निजी विश्वविद्यालयों या कॉलेजों में पढ़ने वाले सिर्फ वे ही छात्र-छात्रायें इस योजना के तहत शिक्षा-ऋण लेने के लिये योग्य होंगे जो या तो नैक से ए ग्रेड मान्यता प्राप्त कॉलेज में दाखिला लेंगे अथवा कोर्स एनबीए से एक्रेडिटेड होगा अथवा कॉलेज एनआईआरएफ रैंकिंग में मौजूद होगा।

धनंजय ने बताया कि देश में इन मानकों को पूरा करने वाले निजी विश्वविद्यालयों एवं कॉलेजों की संख्या काफी कम हैं। बिहार में इन मानकों को पूरा करने वाला एक भी निजी इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं है। बिहार सरकार का कोई सरकारी इंजीनियरिंग कॉलेज भी इन मानकों को पूरा नहीं करता है। पड़ोसी राज्य झारखंड एवं पश्चिम बंगाल में भी कोई निजी इंजीनियरिंग कॉलेज नैक से ए ग्रेड मान्यता प्राप्त नहीं हैं। यहाँ तक कि देश की राजधानी दिल्ली में भी नैक से ए ग्रेड मान्यता प्राप्त कोई निजी इंजीनियरिंग कॉलेज नहीं है। देश के कुछेक यूनिवर्सिटी एवं कॉलेज जो इन मानकों को पूरा करते भी हैं तो वे अपनी सीटें बिहार के साधारण छात्र-छात्राओं को क्यों देंगे। इन परिस्थितियों में राज्य सरकार का 75 हजार छात्र-छात्राओं को शिक्षा-ऋण देने का लक्ष्य एक सपना मात्र बनकर रह जायेगा।

धनंजय ने कहा कि देश में शायद ही कोई ऐसा स्वतंत्र पॉलिटेक्निक कॉलेज हो जो नैक से ए ग्रेड मान्यता प्राप्त हो या जिसके कोर्स एनबीए से एक्रेडिटेड हों। केन्द्र सरकार के एनआईआरएफ रैंकिंग में पॉलिटेक्निक कॉलेजों की लिस्टिंग ही नहीं की जाती है, तो आखिर पॉलिटेक्निक पढ़ने के लिये छात्र-छात्रायें देश के किन-किन कॉलेजों में दाखिला लें, यह लिस्ट भी राज्य सरकार को जारी करनी चाहिये। धनंजय ने बताया कि फार्मेसी एवं नर्सिंग पढ़ने के लिये शायद ही देश में कोई नैक ए ग्रेड कॉलेज है या ये कोर्स शायद ही कहीं एनबीए से एक्रेडिटेड हों या एनआईआरएफ रैंकिंग में हों, तो आखिर इन कोर्सों को पढ़ने के लिये बिहार के छात्र-छात्रायें कहाँ दाखिला ले ताकि उन्हें बिहार स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड से शिक्षा-ऋण मिल सके, यह लिस्ट भी राज्य सरकार को जारी करना चाहिये था।

धनंजय ने कहा कि वास्तव में यह राज्य सरकार का अव्यावहारिक निर्णय है। शायद किसी भ्रम में ऐसा कर लिया गया है। इसमें सुधार की शीघ्र आवश्यकता है। राज्य के मुख्यमंत्री से सीधे एवं प्रत्यक्ष तौर पर इसमें रूचि लेकर आवश्यक सुधार करने चाहिये ताकि हजारों-हजार छात्र-छात्राओं के सपनों के पंख उड़ान लेने से पहले ही टूट कर बिखर न जायें।


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