1857 से 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक संघर्ष की रही लंबी परंपरा, अनेक सेनानियों ने त्याग, बलिदान और साहस से रचा इतिहास
मधेपुरा/बिहार : देश अपनी स्वतंत्रता के आठ दशक पूरे करने की ओर बढ़ रहा है। आजादी की इस लंबी यात्रा में स्वतंत्रता संग्राम के उन अनगिनत नायकों को याद करना जरूरी है, जिन्होंने अपना जीवन, सुख-सुविधाएं और यहां तक कि प्राण तक राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए न्योछावर कर दिए। स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में मधेपुरा की भूमिका भी कम गौरवशाली नहीं रही है। यहां के लोगों ने विभिन्न चरणों में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष करते हुए राष्ट्रीय आंदोलन को मजबूती प्रदान की।
आजाद पुस्तकालय के सचिव, युवा साहित्यकार एवं इतिहासकार डा. हर्ष वर्धन सिंह राठौर के अनुसार मधेपुरा का इतिहास केवल प्रशासनिक विकास की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक जागरण और राष्ट्रीय चेतना के संघर्षों से भी गहराई से जुड़ा रहा है। उनके मुताबिक वर्ष 1845 में तीन सितंबर को मधेपुरा भागलपुर जिले के अंतर्गत एक अनुमंडल के रूप में अस्तित्व में आया था। उस समय इसके प्रशासनिक क्षेत्र में वर्तमान सुपौल और सहरसा के कुछ हिस्से भी शामिल थे, जो बाद में अलग प्रशासनिक इकाइयों के रूप में विकसित हुए। वर्ष 1911 तक मधेपुरा बंगाल प्रांत के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में भी जाना जाता रहा।
राष्ट्रीय आंदोलन के हर दौर में मधेपुरा की सक्रिय मौजूदगी
डा. राठौर बताते हैं कि वर्ष 1857 के सिपाही विद्रोह के समय देश के अन्य हिस्सों की तरह मधेपुरा क्षेत्र में भी अंग्रेजी शासन के प्रति असंतोष बढ़ा। बाढ़, अकाल और महामारी जैसी कठिन परिस्थितियों के बीच 1857 के विद्रोह ने लोगों के भीतर अंग्रेजी शासन के खिलाफ राष्ट्रीय चेतना को और मजबूत किया। इसके बाद राजनीतिक और सामाजिक जागरण का सिलसिला तेज हुआ। वर्ष 1908 में पटना में आयोजित बिहार कांग्रेस के प्रांतीय अधिवेशन में मधेपुरा से रासबिहारी मंडल की भागीदारी रही। वर्ष 1910 के इलाहाबाद कांग्रेस अधिवेशन में भी मधेपुरा से छह प्रतिनिधियों की भागीदारी का उल्लेख मिलता है।
खिलाफत आंदोलन के दौर में डॉ. राजेंद्र प्रसाद और शौकत अली बंधुओं ने मधेपुरा में सभा कर अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनमत तैयार करने का आह्वान किया। वहीं 13 फरवरी 1919 को रौलेट एक्ट के विरोध में पछगछिया के राम बहादुर सिंह ने गिरफ्तारी देकर राष्ट्रीय आंदोलन में अपनी भूमिका दर्ज कराई। कलकत्ता अधिवेशन के बाद वर्ष 1920 में मधेपुरा अनुमंडलीय कांग्रेस का गठन हुआ, जिसमें श्याम सुंदर प्रसाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उनके प्रयासों से तत्कालीन सीरीज इंस्टीट्यूट के शिक्षक शिवनंदन प्रसाद मंडल कांग्रेस से जुड़े और स्वतंत्रता आंदोलन को नई दिशा मिली। सामाजिक समरसता, जातीय भेदभाव और निरक्षरता के खिलाफ चलाए गए प्रयास भी इस दौर की महत्वपूर्ण उपलब्धियां रहे।
राष्ट्रीय नेताओं के आगमन से मिला आंदोलन को नया बल
युवा इतिहासकार डा. हर्ष वर्धन सिंह राठौर के अनुसार वर्ष 1921 में भागलपुर के प्रेमशंकर बोस ने अपनी टीम के साथ मधेपुरा पहुंचकर राष्ट्रीय आंदोलन को दिशा दी। इसके बाद डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, डॉ. राममनोहर लोहिया, श्रीकृष्ण सिंह और दीप नारायण सिंह जैसे राष्ट्रीय नेताओं का भी मधेपुरा क्षेत्र में आगमन हुआ। असहयोग आंदोलन के दौरान छात्र नेता भूपेंद्र नारायण मंडल और प्रताप झा के नेतृत्व में विद्यालय बहिष्कार आंदोलन विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। इससे विद्यार्थियों और युवाओं में भी राष्ट्रीय चेतना का विस्तार हुआ।
महिलाओं ने भी निभाई महत्वपूर्ण भूमिका
स्वतंत्रता आंदोलन में मधेपुरा की महिलाओं की भागीदारी के भी प्रमाण मिलते हैं। विदेशी वस्त्र बहिष्कार आंदोलन के दौरान रजनी बभनगामा सहित विभिन्न क्षेत्रों के लोगों ने सक्रिय भूमिका निभाई। इस दौर में स्थापित किए गए कई चरखा केंद्रों में महिलाओं की उल्लेखनीय भागीदारी रही। डा. राठौर के अनुसार इससे स्पष्ट होता है कि राष्ट्रीय आंदोलन केवल पुरुषों तक सीमित नहीं था, बल्कि मधेपुरा की महिलाओं ने भी स्वदेशी और स्वतंत्रता आंदोलन को मजबूती देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। डा. श्यामा प्रसाद घोष के सहयोग और बरैल के गंगा प्रसाद सिंह की पहल से स्थापित चितरंजन लाइब्रेरी भी अंग्रेज विरोधी गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र बनी। समय के साथ यह कांग्रेस कार्यालय और बाद में शिवनंदन प्रसाद सेवा आश्रम के रूप में अपनी भूमिका निभाती रही।
नमक कानून तोड़कर अंग्रेजी हुकूमत को दी चुनौती
5 मई 1930 को राम बहादुर सिंह के नेतृत्व और शिवाधीन सिंह के आयोजन में हुए कार्यक्रम के दौरान सुबालाल यादव ने मिट्टी से नमक तैयार कर नमक कानून तोड़ा। पुलिस की कार्रवाई की सूचना मिलते ही वे नमक की पोटली लेकर वहां से निकल गए।
इसके बाद पुलिस ने राम बहादुर सिंह, शिवाधीन सिंह समेत कई लोगों को गिरफ्तार कर मधेपुरा लाया। पुलिस कार्रवाई में महताब लाल यादव, शिवनंदन प्रसाद मंडल और कमलेश्वरी प्रसाद मंडल को भी हिरासत में लिया गया। वर्ष 1930 तक मधेपुरा अंग्रेज विरोधी आंदोलन का प्रमुख केंद्र बन चुका था। बिहपुर सत्याग्रह आंदोलन में मधेपुरा की भूमिका इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। राजेंद्र प्रसाद को बचाने में सिंहेश्वर झा ने दी जानस्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का एक मार्मिक प्रसंग सिंहेश्वर झा से जुड़ा है।
डा. राठौर के अनुसार बिहपुर कांग्रेस भवन को अंग्रेजों के कब्जे से मुक्त कराने के दौरान डॉ. राजेंद्र प्रसाद पर लाठीचार्ज हुआ। इस दौरान करामा के सिंहेश्वर झा उनके शरीर पर गिरकर उन्हें बचाने का प्रयास करते रहे।बाद में पुलिस ने सिंहेश्वर झा को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस हिरासत में उनके साथ की गई अमानवीय कार्रवाई के कारण उनकी मृत्यु हो गई। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने भी अपनी आत्मकथा में सिंहेश्वर झा के इस बलिदान का उल्लेख किया है। यह प्रसंग मधेपुरा के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में त्याग और बलिदान का अत्यंत भावुक अध्याय है।
स्वतंत्रता सेनानियों की लंबी कतार ने बढ़ाया संघर्ष
वर्ष 1932 में बैद्यनाथ धर मजूमदार को अनुमंडलीय कांग्रेस का अध्यक्ष बनाए जाने के बाद राष्ट्रीय आंदोलन को मधेपुरा में और गति मिली। इस दौर में कार्तिक प्रसाद सिंह, छेदी झा द्विज्वर, सूर्य नारायण झा, ईश्वरी सिंह, शिवाधीन सिंह, नंद किशोर चौधरी, चित्र नारायण, सुबालाल यादव, कमलेश्वरी प्रसाद मंडल, भूपेंद्र नारायण मंडल, शिवनंदन प्रसाद मंडल, मोहम्मद कुदरतुल्लाह काजमी और देवता प्रसाद सिंह सहित अनेक सेनानियों ने अग्रिम पंक्ति में रहकर संघर्ष किया। बोरिशाल, जो अब बांग्लादेश में है, से जिला बदर किए गए अनुशीलन समिति के सदस्य मोहित चंद्र अधिकारी ने मधेपुरा क्षेत्र में अपने बहनोई योगेंद्र नाथ मजूमदार के यहां शरण ली और यहां क्रांतिकारी गतिविधियों को संगठित किया। अंग्रेज समर्थक अमरपुर के महंत के घर हमले और हत्या के मामले में मोहित चंद्र अधिकारी को काला पानी की सजा सुनाई गई। डा. राठौर के अनुसार वे उत्तर बिहार के उन शुरुआती स्वतंत्रता सेनानियों में थे जिन्हें काला पानी की सजा मिली।
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन मधेपुरा के इतिहास का स्वर्णिम अध्याय
मधेपुरा के स्वतंत्रता आंदोलन में 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक रहा। डा. हर्ष वर्धन सिंह राठौर के अनुसार इस दौर में मधेपुरा में सियाराम दल का भी व्यापक प्रभाव था, विशेषकर गंगा और कोसी क्षेत्र में।भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान विभिन्न सरकारी कार्यालयों पर कांग्रेस का झंडा फहराया गया। मधेपुरा और किशुनगंज थाना पर कब्जे के प्रयास, बिहारीगंज रेलवे स्टेशन और डाकघर में तोड़फोड़ जैसी घटनाएं अंग्रेजी शासन के खिलाफ बढ़ते जनाक्रोश को दर्शाती हैं।
किशुनगंज के बाजा शाह पुलिस की गोली से शहीद होने वाले प्रमुख सेनानियों में शामिल थे। उन्हें 20 अगस्त को गोली मारी गई थी। वहीं मनहरा के चूल्हाय यादव भी पुलिसिया कार्रवाई में शहीद हुए।इसी दौर में हजारीबाग जेल से निकलने के बाद जयप्रकाश नारायण मधेपुरा क्षेत्र में भूमिगत रहे। वे विजया पटवर्धन के साथ हाथी पर सवार होकर सरोपट्टी पहुंचे। बाद में कार्तिक प्रसाद सिंह के सहयोग से नेपाली क्षेत्र में आजाद दस्ता का प्रशिक्षण शिविर स्थापित किया गया, जिसमें डॉ. लोहिया भी जुड़े। बाद में उन्हें गिरफ्तार कर हनुमाननगर जेल में रखा गया। मधेपुरा के युवाओं ने सियाराम दल के सहयोग से जेल पर कार्रवाई कर इन नेताओं को मुक्त कराने में भूमिका निभाई।
15 अगस्त 1947 की आजादी बनी वर्षों के संघर्ष का परिणाम
वर्ष 1947 आते-आते देश के अन्य हिस्सों की तरह मधेपुरा में भी स्वतंत्रता आंदोलन अपने निर्णायक दौर में पहुंच चुका था। आखिरकार 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ। यह आजादी उन असंख्य ज्ञात-अज्ञात सेनानियों के त्याग, संघर्ष और बलिदान का परिणाम थी, जिन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ अपने जीवन की परवाह किए बिना संघर्ष किया।आजादी के बाद भारत ने करीब आठ दशक की यात्रा पूरी की है। इस दौरान देश ने सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक, वैज्ञानिक और तकनीकी सहित अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। मधेपुरा भी विकास की इस यात्रा में लगातार आगे बढ़ रहा है।मधेपुरा के स्वतंत्रता संग्राम की यह गौरवशाली गाथा आज की पीढ़ी के लिए केवल इतिहास नहीं, बल्कि प्रेरणा का स्रोत है। स्वतंत्रता सेनानियों के संघर्ष, शहादत, कुर्बानी और त्याग को याद करना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। आजादी की 80वीं वर्षगांठ की ओर बढ़ते इस दौर में मधेपुरा उन सभी अमर सेनानियों को नमन करता है, जिन्होंने राष्ट्र की स्वतंत्रता के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
डा. हर्ष वर्धन सिंह राठौर
प्रधान संपादक, युवा सृजन
सचिव, आजाद पुस्तकालय

