“पवित्र रमजान : रहमत,  मगफिरत व जहन्नम से निजात का महीना”

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रमजान वह पवित्र माह है जिसमें पवित्र कुरआन का अवतरण हुआ जिसे ईश्वर ने समस्त मानव जाति के मार्गदर्शन के लिए भेजा है। इस्लाम की बुनियाद पाँच स्तम्भ पर है। उनमें रोजा भी एक अनिवार्य और मुख्य स्तंभ है जो इस्लामी कैलेंडर के मुताबिक रमजान के महीने में होता है।

“ऐ लोगों जो ईमान लाए हो तुम्हारे लिए रोजे अनिवार्य कर दिए गए, जिस तरह तुमसे पहले नबियों के अनुयायियों के लिए अनिवार्य किए गए थे।इससे उम्मीद है कि तुम में तकवा पैदा हो।”                   (पवित्र कुरआन 2:183) : 

सुबह से शाम तक खाना पीना से रूक जाना रोजा (उपवास) है। कैसा ही रूचिकर भोजन हो, कितनी ही भूख प्यास हो इंसान खाने पीने से रूक जाता है। यहाँ तक कि कोई देखने वाला भी न हो तब भी एक बूँद पानी पीना भी मना है। इसके पीछे ईशपरायणता और परलोक का भय रहता है। ईश्वर के सर्वव्यापी और सर्वज्ञाता होने का विश्वास है। आखिरत के जीवन और अल्लाह की अदालत पर ईमान है। पवित्र कुरआन और जगत गुरु हजरत मुहम्मद (सल्ल०) के संदेशों का पूर्ण आज्ञापालन है। कर्तव्यपालन की प्रबल अनुभूति, धैर्य और संकटों के मुकाबले का अभ्यास है। ईश्वर की प्रसन्नता की अपेक्षा मन की ईच्छाओं को रोकने और दबाने की शक्ति है। रोजा प्रत्येक वर्ष हमें प्रशिक्षित कर समस्त मानवीय गुणों का विकास करता है। हमदर्दी, प्रेम नैतिक पवित्रता और आचरण सौंदर्य का विकास करता है।

“जो व्यक्ति इस महीने में किसी रोजेदार को ईफ्तार कराए तो उसके लिए गुनाहों से मुक्ति और नरक की आग से रिहाई है। उसको उतना ही पुण्य मिलेगा जितना रोजेदार को और इससे रोजेदार के सबाब(पुण्य)में कोई कमी न आएगी।”

सहाबा(रजि०) ने कहा कि ऐ अल्लाह के रसूल (सल्ल०) हममें सबके पास तो इतना सामान नहीं होता कि रोजेदार को इफ्तार कराएँ ,आप(सल्ल०) ने कहा- अल्लाह यह सबाब (पुण्य)उसे भी प्रदान करता है जो एक घूँट दूध, एक खजूर या पानी का एक घूँट से किसी रोजेदार को ईफ्तार कराए। फिर कहा- जो किसी रोजेदार को पेट भर कर खाना खिलाए तो अल्लाह उसको अपने हौज से इतना तृप्त करेगा कि उसे कभी प्यास न लगेगी यहाँ तक कि वह स्वर्ग में प्रवेश कर जाए।”

    जगत गुरू हजरत मुहम्मद (सल्ल०) : रमजान के महीने में संपन्न, धनवान और खुशहाल लोगों को उपवास रखकर उस अवस्था का व्यवहारिक अनुभव होता है कि निर्धन, दरिद्र, अनाथ और जीविका सामग्री से वंचित लोगों को भूख किस तरह सताती होगी। इस अनुभूति से संपन्न वर्ग के हृदय वंचित वर्ग के प्रति कोमल दयापूर्ण और कृपाशील बनते हैं।

रमजान में सदका ए फित्र और जकात भी अदा की जाती है जिससे गरीबों और अनाथों की आर्थिक सहायता होती है।इस्लाम कहता है कि खर्च करने से व्यक्ति निर्धन नहीं हो जाता बल्कि संपत्ति बढ़ेगी।

जीवन में हर कोई सफल होना चाहता है और सफल होने के लिए अच्छे कर्म की आवश्यकता है।रोजा केवल भूखे रहने का नाम नहीं अपितु बुराईयों को दूर करने और अच्छाइयों को फैलाने का नाम है।उपासना, जनसेवा और मानव कल्याण का नाम है।इसलिए आईए इस पवित्र कर्म के मूल उद्देश्यों को हम अपने जीवन में उतारें।

लेखक –  ✍️  मंजर आलम  (स्वतंत्र टिप्पणीकार)


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