Lockdown Effect  : गरीबों के सामने फ़ाकाकशी की हालत, खाना मांगकर भर रहे हैं बच्चों का पेट

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अमित कुमार अंशु
उप संपादक

मधेपुरा/बिहार : कोरोना वायरस को लेकर केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार द्वारा लॉक डाउन कर दिया गया है, लॉक डाउन के कारण सभी कामकाज हो चुके हैं, लोग अपने घरों में बंद हैं। लोगों को सिर्फ जरूरी कामों के लिए ही बाहर सड़कों पर निकलने की छूट दी गई है, बिना काम के सड़कों पर घूमने वाले लोगों पर कार्रवाई भी की जा रही है। कोरोना वायरस एवं प्रशासन के खौफ से लोग बेहद जरूरी होने पर ही सड़कों पर निकल रहे है। ऐसी स्थिति में लोगों का काम प्रभावित हो रहा है। जिनकी आमदनी अच्छी खासी है, उन्होंने तो घरों में राशन पानी जमा कर लिया है। फिर भी छोटे-मोटे सामान के लिए बाजार आ कर सामान लेकर घर वापस चले जाते हैं। लेकिन ऐसे लोग जो रोजाना मजदूरी कर के, रिक्शा चला कर के, ठेला चला कर के अपने घर का भरण पोषण करते थे, वैसे लोगों के सामने अब भुखमरी की स्थिति आ चुकी है।

मजदूरों का रोजाना कमाई ही उसके घर का है सहारा सरकार द्वारा एवं जिला प्रशासन द्वारा लोगों को राशन कार्ड के जरिए राशन उपलब्ध कराने की बात कही गई है। लेकिन जिले में ऐसे लोग भी हैं, जो दूसरे जिले से आकर यहां मजदूरी कर अपना जीवन यापन करते हैं। उनके पास ना तो राशन कार्ड है और ना खाने के लिए पैसे बचे हैं। मजदूरी करने वाले, दूसरे के घरों में काम-काज करने वाले, ठेला चलाने वाले, रिक्शा चलाने वाले एवं सड़कों पर से कचरा उठाकर बेचने वालों के लिए तो रोजाना कमाई ही उसके घर का सहारा होता है। इन रोजाना कमाई में से जो भी कुछ बचा था, वह तो इन 10 दिनों के लॉक डाउन में खत्म हो चुका है। अब उनके घर में खाने के लाले पड़े हुए हैं। बच्चे खाना खोज रहे हैं और उनके माता-पिता के पास पैसे नहीं हैं। ऐसे घरों की स्थिति यह है कि रोजाना सड़कों पर टकटकी लगाए रहते हैं कि कोई आएगा और उन्हें भोजन देकर जाएगा।

भूखे रहकर मरना ही है किस्मत जिला प्रशासन को एवं स्थानीय जनप्रतिनिधियों को ऐसे स्थानों पर जाकर मजदूर वर्ग के लोगों को चिन्हित कर उन्हें राशन मुहैया कराने की जरूरत है। हालांकि स्थानीय युवाओं एवं कई संस्थाओं के द्वारा अपने स्तर से भोजन बनाकर भोजन उपलब्ध कराई जा रही है, लेकिन पूरे दिन भूखे रहने पर एक टाइम ही भोजन मिल पाना, इन लोगों के लिए ना के बराबर साबित हो रहा है। बुधवार को जब स्थानीय युवा भिरखी स्लीपर फैक्ट्री रोड मछली बाजार पहुंचे तो वहां कुछ ऐसे लोग एवं उनके बच्चे उन पर टूट पड़े। उन लोगों ने कहा कि उनके घर में दो दिनों से खाना नहीं बना है और बच्चे भूखे रो रहे हैं। उन्होंने बताया कि इसकी सूचना उन्होंने स्थानीय जनप्रतिनिधि को भी दी लेकिन अब तक किसी ने भी कुछ नहीं किया। उन्होंने बताया कि वे लोग इसकी सूचना देने के लिए अधिकारियों के पास भी नहीं जा सकते हैं क्योंकि सड़कों पर पुलिस प्रशासन का डर बना हुआ है। अब ऐसी स्थिति में भूखे रहकर मरना ही किस्मत है।

घर में ना तो अनाज है और बचे हुए हैं पैसे मधेपुरा जिले के ही बिहारीगंज प्रखंड निवासी विधवा सिंधु देवी ने बताया कि वह यहां पर तीन-चार साल से किराए पर कमरा लेकर रहती है। जिसका किराया 15 सौ रुपया महीना है। दुकानों में मजदूरी का काम करती है। जिससे वह छह हजार रुपया कमाती है। उन्हें दो पुत्र एवं एक पुत्री है. उन्होंने बताया कि मजदूरी करके उन्होंने जो पैसा बचा कर रखा था, वह अब खर्च हो चुका है। घर में ना तो अनाज है और पैसे बचे हुए हैं और ना ही किराया देने के लिए पैसे बचे हुए हैं। बच्चे भूख से बिलखते रहते हैं। जिसके कारण दूसरों से खाना मांग कर बच्चों का पेट भर पा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिला निवासी विधवा रानी देवी ने बताया कि वह लगभग एक साल से  यहां किराया पर कमरा लेकर रहती है। उनका भी किराया 15 सौ रुपया है। लोगों के घरों में काम करके अपने एवं एक पुत्र एवं एक पुत्री का पेट भर पाती है। कोरोना वायरस के डर से लोगों ने अब घरों पर काम करने के लिए मना कर दिया है। जिसके कारण घर में भुखमरी की स्थिति आ गई है।

आमदनी बंद हो चुकी है, पैसे हो चुके हैं खत्म खगड़िया जिला निवासी विधवा रेखा देवी भी घरों में काम कर के अपने दो पुत्र एवं एक पुत्री का पेट भर पाती हैं। वह भी यहां लगभग 10 साल से किराया पर रूम लेकर रहती है। वहीं स्थानीय निवासी विधवा कलबतिया ऋषिदेव ने बताया कि वह सड़कों पर कचरा चुनकर उसे बेचकर अपना भरण-पोषण करती है। उन्होंने बताया कि पति के गुजर जाने के बाद वह इसी तरह भरण पोषण कर अपनी एक पुत्री का विवाह करवाया। जिसके बाद वह अपने घर में अकेले हो चुकी है। उन्होंने बताया कि अकेले होने के कारण अब उनके पास खाने पीने के लिए कोई दूसरा उपाय भी नहीं है। वही सहरसा जिला निवासी मजदूर विजय राम की पत्नी हेमा देवी एवं कुर्सेला निवासी मजदूर कुंदन साह की पत्नी सिन्नी देवी ने बताया कि उन लोगों की भी यही स्थिति है। वे लोग भी यहां पर किराए पर कमरा लेकर रहते हैं और रोजाना मजदूरी करके अपने घर का भरण-पोषण करते हैं। मजदूरी बंद हो चुकी है, आमदनी बंद हो चुकी है, पैसे खत्म हो चुके हैं और बच्चे भूखे रो रहे हैं।


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