अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर अतिथि संपादक प्रसन्ना सिंह राठौर की कलम से

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प्रसन्ना सिंह राठौर
अतिथि संपादक

आज नारी सुरक्षा संदेह के घेरे में है। वर्तमान में नारी सामाजिक न्याय से वंचित होने के साथ-साथ शोषित और दलित सी प्रतीत होती है। वस्तुत यह पीड़ा नारी के साथ मात्र हमारे देश में ही नहीं है, बल्कि कई अन्य देशों की हालत तो इससे भी बदतर है। इतिहास का अध्यन इसे प्रमाणित भी करता है कि नारी की यह दशा पूर्व से ही है।

आज विश्व शक्ति की उपमा से विभूषित में भी कई क्षेत्रों में नारी को समनाधिकार प्राप्त नहीं है। आजादी के कई दशक उपरांत भी अमेरिका महिला राष्ट्रपति के हांथो में नेतृत्व देने में असमर्थ रहा है। दुनिया की सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश चीन साम्यवाद के सिद्धांत पर सबको बराबरी का दंभ तो भरता है मगर नारी को बराबरी का अधिकार देने में सर्वथा असमर्थ रहा है। दूसरी तरफ हमारे देश में नारी-कल्याण के सन्दर्भ में अनेकानेक कानून बनाए गए, लेकिन सार्थक प्रयास के अभाव में यहां भी नारी सुरक्षित और सबल नहीं बन पाई। युवाओं के आदर्श स्वामी विवेकानंद ने एक बार कहा था “नारी समाज के हालात में सुधार किए बिना संसार का कल्याण नहीं हो सकता”। आज भी हमारे समाज में औरत जब घर से निकलती है तो लौटते तक मन में कई आशंकाएं उत्पन्न होती रहती है। आए दिन समाज में औरतों के साथ घट रही घटनाएं दर्शाती है कि आज नारी बाहर ही नहीं बल्कि अंदर भी असुरक्षित है। अब तो ऐसा लगने लगा है कि कोई भी रिश्ता विश्वास योग्य नहीं है। भाई, पिता, चाचा, मामा यहां तक की सर्वाधिक सम्मानित गुरुजी के रिश्ते भी दागदार हो चले हैं।

यौन-शोषण के विभिन्न रूपों में में प्रताड़ित करके मार देना अथवा सामाजिक अपमान व लज्जा से भय खाकर पीड़िता के द्वारा आत्महत्या जैसी ख़बरें सामाचार पत्रों में अलग-अलग रूपों में हर पल छाई रहती है। अब तो नारी नासमझ बच्चियों के साथ समाज में घट रही घटनाएं समाज को यह सोचने पर मजबुर कर रही है कि ईश्वर की सर्वोत्तम रचना का दंभ भरने व नारी को देवी का दर्जा वाले हम किस युग में जी रहे हैं ? विषम परिस्थितियों में नौ माह गर्भ में रखकर जिसको जन्म देती है वही विभिन्न स्तरों पर जब नारी का शोषण करता है तो कभी कभी ऐसा महसूस होने लगता है कि ऐसे दानवों को नारी जन्म ही क्यों देती है?आज “नारी देवी तुल्य है “का जाप करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि नारी को पूजा की नहीं वरन अधिकार की जरूरत है जिससे वो अपनी सुरक्षा के संदेहों के घेरे से बाहर निकल कर समाज के विकास में प्रतीकात्मक सहयोग की जगह सार्थक सहयोग दे सके। इतिहास के पन्ने हर युग में इस बात के साक्षी रहे हैं कि जिस प्रकार नारी एक पहिया पर कोई रथ नहीं चल सकता उसी प्रकार कोई भी समाज नारी के सहयोग के बिना विकास नहीं कर सकता। महिला दिवस के बहाने इस यक्ष प्रश्न पर मंथन कर महिलाओं की भूमिका को समझने की जरूरत है।


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