सुपौल : खादी के पुजारियों की धरती पर चरखे में लगा दीमक, तिनका-तिनका बिखर गया गांधी का सपना

सुपौल सरकारी अपेक्षा के कारण खंडर में तब्दील त्रिवेणीगंज का चरखा केंद्र का फोटो (फोटो –टीआरटी)
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सरकारी उपेक्षा का शिकार बना त्रिवेणीगंज का चरखा केंद्र

तैयार सूत भेजा जाता था मधुबनी वहां तैयार होती थी खादी

 त्रिवेणीगंज से प्रशांत कुमार की ख़ास रिपोर्ट :

त्रिवेणीगंज/सुपौल/बिहार : समाजवादी व साम्यवादियों का गढ़ और खादी के पुजारियों की धरती पर चरखे में दीमक लग रहा हैं। यहां स्थापित चरखा घर बंद हो गया हैं और इससे जुड़े लोग बेरोजगार हो गए हैं। जबकि जब यह केंद चलता था तो यहां के तैयार सूत से मधुबनी में खादी तैयार होती थी जो गांधीवादी विचारधारा के लोगों का मुख्य पहनावा होता था यह उनकी संस्कृति होती थी यही पूजा थी। लेकिन सरकारी उपेक्षा के कारण तिनका-तिनका में गांधी का सपना बिखर गया है।

समाजवादियों व साम्यवादीयों का गढ़ रहा त्रिवेणीगंज : जब महात्मा गांधी ने भारत के स्वाबलंबन की चिंता करते हुए चरखे और खादी को अपनी नीति और कार्यक्रम का हिस्सा बनाया तब से खादी को नई पहचान मिली। वस्तुतः कपास, रेशम या ऊन के हाथ कते सूत से भारत में हथकरघे पर बुना गया कोई भी वस्त्र खादी हैं। यह सत्य हैं कि चरखा और करधा की जन्मभूमि हिंदुस्तान हैं। सूत कातना और कपड़ा बुनना भारत का प्रचीन उद्योग हैं। त्रिवेणीगंज का इलाका समाजवादियों व साम्यवादीयों का गढ़ माना जाता हैं। यहां स्व.अनुपलाल यादव, स्व.जगदीश मंडल सरीखे समाजवादी नेता हुए  तो उसी विचारधारा के बड़े नाम कुंभनारायन सरदार और जितेंद्र कुमार अरविंद तो वही साम्यवादी विचार धारा के धनी बलराम सिंह यादव, अच्छेलाल मेहता, जयनारायण यादव आदि हैं जो आज भी अपने इस विचारधारा को आगे बढ़ाने में जुटे हैं।

लिहाजा खादी के पुजारी भी काफी हुए इसे देखते हुए केंद्र द्वारा आर्थिक से ग्रामोद्योग विभाग द्वारा निर्मित चरखा केंद्र जिले के दो स्थानों पर 90 के दशक में त्रिवेणीगंज और छातापुर में स्थापित किया गया था। रोजगार के साथ-साथ इलाके के कुटीर उद्योग की स्थापना से लोगों में खुशी का माहौल स्थापित हुआ वही अब इसके पुनः चालू करने की मांग जोर पकड़ने लगी हैं। उद्योगधंधे विहीन क्षेत्र में चरखा केंद्र की स्थापना की जोर-शोर से चर्चा हुई। फलतः लोगों ने भी इसकी सहराना की। नतीजा हुआ कि यह चरखा केंद्र पूरी ऊर्जा से चलने लगा लगा लेकिन एक समय ऐसा भी आया कि पांच वर्ष चलने के बाद आर्थिक मदद के अभाव में केंद बंद हो गया इससे जुड़े लोग बेरोजगार हो गए। लघु उद्योग की तरह चलने वाला चरखा उद्योग बंद बंद हो गया। इसका सीधा और नकारात्मक असर खादी पर पड़ा । बाद में खादी के प्रति लोगों के मन में भी उतना उत्साह नही रहा। परिचित समाजवादी जितेंद्र कुमार अरविंद, सलामत खाँ जिनकी उम्र लगभग अस्सी साल के आसपास हो चुकी हैं खादी के प्रति उनका मोह अब भी बरकरार हैं। लेकिन ढंग का खादी नही मिल पाने का उन्हें मलाल रहता हैं और आजकल बाजार में मिलने वाले खादी को लेकर वे कई शिकायत करते हैं। गांव-समाज का खादी भंडार या तो बंद हो गया हैं या उसकी हालत खस्ता है। निराश  होकर वे शहर से या किसी  और बड़े केंद्र से खादी मंगवाते हैं पहनते हैं और खादी के पुराने दिनों को याद करते हैं। चरखा चलाने और सूत काटने की परंपरा बंद होने के कई कारण रहे होंगे। सूत खरीदे जाने वाले केंद्रों पर उचित कीमत नही मिलने से लेकर कई तरह की गड़बड़ियों के अलावा अपना दैनिक खर्च चलाने के लिए नगद के इंतजाम में चरखा केंद्र से जुड़े लोगों का दूसरे काम में लग जाना मुख्य वजहें रही हैं। लेकिन इसके लिए सरकार की लापरवाही और प्रशासन की घोर उपेक्षा भी कम जिम्मेदार नही रही।

त्रिवेणीगंज स्थित लक्ष्मीनिया निवासी और चरखा केंद्र की स्थापना में महती भूमिका निभाने वाले रघुवीर दास का कहना हैं कि कुटीर उद्योग नही होने से इलाका पूरी तरह कृषि पर केंद्रित हो गया हैं। आज अपने कस्बे और शहर में खादी की हालत देख कर सोचता हूं कि चरखा क्या बंद हुआ शायद खादी ही बंद हो गया हैं। चूंकि बहुत सारे लोग चरखा चला कर कुछ अर्जित करने के कार्य में लगें थे।चरखा केंद्र खुलना जरूरी हैं इससे कई फायदे हैं पहली बात लोगों को घर बैठे रोजगार मिल जाएगा। दूसरी यह कि इलाके से पलायन में कमी आएगी। इस संबंध में मारबाड़ी युवा मंच अध्यक्ष प्रकाश केजरीवाल, मारबाड़ी युवा मंच के सचिव मनीष अग्रवाल, डॉ. अमित कुमार, कॉ. राजेश कुमार गजेश, समाजसेवी ई. अमरदीप, समाजसेवी गौरी शंकर, सचिन गौर भारद्वाज आदि का कहना हैं कि चरखा केंद्र बंद होने के बाद कि अर्थव्यवस्था पर इसका बुरा असर प्रभाव पड़ा। महिलाओं की आत्मनिर्भरता और स्वावलंबन की कोशिशें कमजोर हुई।

आज भले ही नए सिरे से खादी को सजाने-सँवारने का भरसक प्रयास किया जा रहा हो जिले में दो-चार चमकते-दमकते खादी मेला लगा लिया जाए लेकिन इसे अब उसके उस पुराने रंग में लाने में लंबा वक्त लग जाएगा । जो रुतबा इसका बर्षो पहले हुआ करता था। यह बात सभी जानते हैं कि खादी गांधी को बहुत प्रिय थी और वे खुद चरखा चलाते थे। गुजरा जमाना बार-बार नही आता। अगर हमने समय रहते इसे सहेजा होता और खादी की कीमत को समझने वाले लोगों और खासतौर चरखा चलाने वाली महिलाओं की मेहनत की कद्र की होती तो आज खादी इतनी लाचार नही दिखाई देती, आज भी अगर इसके उत्पादन में ग्रामीण स्तर पर लोगों की भूमिका को सुनिश्चित किया जाए तो इससे न सिर्फ खादी की हालत में सुधार होगा बल्कि ग्रामीण इलाकों की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।


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