शिक्षा और शिक्षकों के प्रति सत्तारूढ़ एनडीए सरकार की बेरुखी : आखिरकार बिहार की जनता कब जागेगी ? 

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मंजर आलम,
(स्वतंत्र टिप्पणीकार)

बिहार : यूँ तो पटना की सड़कों पर रोज ही रैली, धरने और प्रदर्शनों का दौर चलता रहता है। गांधी मैदान के आसपास टेंट जमाए प्रदर्शनकारी अपनी माँगों को लेकर सरकार के समक्ष अपनी बात पहूंचाने का हरसंभव प्रयास करते नजर आ जाएँगे। मीडियाकर्मियों का भला हो जो अगले दिन अपने अखबारों, चैनलों, न्यूज वेब पोर्टलों पर उन प्रदर्शनों की खबरों को सुर्खियां प्रदान कर सरकार तक बातें पहूंचाने में उनकी मदद करता है।

बिहार राज्य शिक्षक संघर्ष समन्वय समिति के बैनर तले राज्य के लाखों नियोजित शिक्षकों द्वारा आज पटना में विशाल प्रदर्शन भी उसी घटनाक्रम का एक हिस्सा बना जहाँ प्रदेश के लाखों शिक्षकों ने समान काम के लिए समान वेतन के चिर परिचित मुद्दे पर सरकार के समक्ष उपस्थिति दर्ज कराई। बिहार विधानसभा का घेराव और विशाल प्रदर्शन के द्वारा सरकार तक अपनी माँगों को पहूंचाने के अथक प्रयास करते हुए सत्तारूढ़ एनडीए सरकार के पुलिस के हाथों लाठीचार्ज , वाटरकैनन, आँसू गैस का सामना करने की खबरें सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रही हैं।

यकीनन कल के अखबारों में भी यह खबर प्रमुखता से देखने को मिलेगी। निःसंदेह सरकार का यह रवैया तानाशाही का परिचायक है और घोर निंदनीय भी।निश्चय ही गुरूओं का अपमान बिहार की संस्कृति से मेल नहीं खाता क्योंकि यह वही बिहार है जहाँ नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्व प्रसिद्ध विश्वविद्यालय स्थापित थे जहाँ दुनिया भर से लोग शिक्षा ग्रहण करने आते थे।बिहार चाणक्य की भूमि रही है जिसने अपनी बुद्धिमानी से अहंकारी शासक को सत्ता से बेदखल करवा दिया था। महात्मा बुद्ध की ज्ञानस्थली रही बिहार में गुरूओं के साथ दुर्व्यवहार कतई शोभा नहीं देता।इसकी जितनी भी भर्त्सना की जाए कम ही होंगी।

इन सबके बीच कई बातें सोचने को विवश भी करती है और बहुत ही गंभीरतापूर्वक सोचना भी चाहिए। शिक्षा हम सबका मौलिक अधिकार है।किसी भी राष्ट्र के सामाजिक,राजनीतिक, आर्थिक उन्नति के लिए शिक्षा अत्यंत ही महत्वपूर्ण है।शिक्षा के बिना मानव जीवन अंधकारमय है।इसलिए शिक्षा के अधिकार को बुनियादी हक बनाया गया है।बेहतर शिक्षा-व्यवस्था प्रदान करना राज्य सरकार की अहम जिम्मेदारी है ।यकीनन सरकार ने इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण काम भी किए हैं ,लेकिन क्या सरकार इस मामले में उतनी गंभीर है जितना होना चाहिए। सरकारी स्कूलों की जमीनी हकीकत कुछ और ही ब्याँ करती हैं।

 सरकारी विद्यालयों के शिक्षा की गुणवत्ता में काफी गिरावट आई है।सरकार प्रायोजित महत्वाकांक्षी योजनाएँ जमीनी स्तर पर फ्लाप साबित हो रही हैं।निश्चय ही नामांकन का प्रतिशत बढ़ा है लेकिन उस रफ्तार में छात्रोपस्थिति नहीं है।विद्यालयों की निगरानी के लिए गठित विद्यालय शिक्षा समिति हो या विभागीय पदाधिकारी ,अधिकांशतः अपने दायित्वों से विमुख नजर आते हैं। विद्यालयों में छात्रों के अनुपात में शिक्षकों की घोर कमी है।एक ओर टीईटी उत्तीर्ण अभ्यर्थियों का एक बड़ा वर्ग अपनी बहाली को लेकर असमंजस में है तो दूसरी ओर बिहार के सरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों को ससमय वेतन देना भी सरकार के लिए एक चुनौती है।

शिक्षा के क्षेत्र में जनता को विकास का एहसास दिलाने के लिए ताबड़तोड़ विद्यालयों का उत्क्रमण जारी है।प्राथमिक विद्यालयों को उत्क्रमित मध्य विद्यालयों, और मध्य विद्यालयों को उत्क्रमित माध्यमिक और उच्च माध्यमिक विद्यालयों में बदला जा रहा है।परंतु ग्राउंड रिपोर्ट बता रही है कि अधिकांश उत्क्रमित उच्च विद्यालयों में शिक्षकों की संख्या नगण्य है।मध्य विद्यालयों के शिक्षकों के सहारे वहाँ की व्यवस्था चलायी जा रही है।वहीं अधिकांशतः उत्क्रमित मध्य विद्यालयों में स्नातक ग्रेड के विषयवार शिक्षक नहीं हैं लेकिन न तो इसकी बहाली हो रही है और न ही बेसिक ग्रेड के स्नातक योग्यताधारियों का पदोन्नति ही की जा रही है।भला ऐसे में शिक्षा व्यवस्था पटरी पर कैसे आएगी?

 विभागीय अधिकारियों का विद्यालय निरीक्षण सिर्फ इस उद्देश्य से होता है कि कुछ शिक्षक अनुपस्थित पकड़े जाएं या फिर एमडीएम में कोई खामी नजर आ जाए ताकि उपरी आय हो सके।निःसंदेह शिक्षकों की उपस्थिति और मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता का निरीक्षण होना चाहिए परंतु वर्ग कक्ष की गतिविधियों अध्ययन-अध्यापन की जांच भी उतनी ही जरूरी है। बच्चे स्कूली पोशाक में नहीं हैं ,उनके पास निर्धारित पुस्तकें नहीं हैं , विद्यालयों में खेलने के संसाधन नहीं हैं  लैब, पुस्तकालय और अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी है शायद ही इस ओर कभी अधिकारियों की नजर जाती हो ।भला ऐसे में बेहतर शैक्षणिक माहौल कैसे बन पाएगा साहब !जब शिक्षा की बुनियाद ही कमजोर होगी तो फिर उच्च शिक्षा और शोध की परिकल्पना कैसे संभव होगा?जरा आप भी ठंडे दिल से सोचिए।

 एक सवाल और कि आखिरकार,मंत्रियों पदाधिकारियों, नेताओं और यहाँ तक कि विद्यालय के शिक्षकों के बच्चे भी यहाँ नहीं आते ।ऐसा क्यों साहब? शायद इसलिए कि आपके बच्चे उन चमचमाते साधन संपन्न पब्लिक स्कूल में पढ़ने जाते हैं। एक बार समान विद्यालय प्रणाली लागू करके तो देखिए कितनी प्रतिभा है बच्चों में।

शिक्षकों को समुचित वेतनमान देने के लिए आपके पास राशि का अभाव हो जाता है , इस मुद्दे पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय तक डटकर मुकाबला करते हैं।अपनी जायज माँग के लिए संघर्ष करे तो उसे कुचलने का हरसंभव प्रयास करते हैं लेकिन उस समय पैसा कहाँ से आ जाता है साहब जब मंत्रियों , विधायकों और सांसदों के वेतन बढ़ोत्तरी को सर्वसम्मति से पास करवा लिया जाता है।तब तो कोई हंगामा नहीं होता , पक्ष और विपक्ष नहीं होते!

यकीनन हमारी सरकार की सोच शिक्षा विरोधी है। शिक्षा को गंभीरता से लिया होता तो लोगों की यह शिकायत नहीं होती  कि स्कूलों के अधिकांशतः शिक्षक शिक्षिकाओं में टैलेंट की कमी है।सच्चाई कुछ न कुछ तो जरूर है लेकिन इसमें उनकी क्या गलती।कौन नहीं चाहता कि उन्हें रोजगार मिल जाए।  लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि यह वही बिहार है जहाँ शिक्षकों की भर्ती बिहार लोक सेवा आयोग(बीपीएससी) के द्वारा भी हुई है। उन्हें समुचित वेतनमान भी मिल रहा है।लेकिन आज शिक्षकों को अपने समुचित वेतनमान के लिए लाठियां खानी पड़ रही है क्योंकि उन्हें स्कूल में बेहतर शिक्षा नहीं ब्लकि बच्चों को सिर्फ रोक कर रखना है।

काश ! इस हकीकत को आमजन समझ पाते। आर्थिक रूप से कमजोर,पिछड़े समाज के बच्चों को भी शिक्षा पाने का उतना ही अधिकार है जितना आर्थिक रूप से संपन्न लोगों के बच्चों का ।सरकार की मंशा को हमने कभी गंभीरता से नहीं लिया। सरकार चुनते समय हमने बदहाल शिक्षा को मुद्दा नहीं बनाया तो फिर आज किस मुँह से हम सरकार की आलोचना  करें और क्यों?

चुनाव के समय आंदोलनकारी शिक्षकों का एक बड़ा वर्ग सरकार की नीतियों में विकास की झलक देख रहे थे।जाति धर्म और संप्रदाय के सामने शिक्षा स्वास्थ्य और बेरोजगारी जैसे मुद्दे को हेंच नजरिए से देख रहे थे तो भला आज आप सरकार की खिलाफ प्रदर्शन क्यों कर रहे हैं? यह सच है कि आपने ही चुनकर सत्ता के शीर्ष पर पहूंचाया है तो सत्ता से बेदखल भी आप ही करेंगे ।जरा सोचिए क्या आज वह साहस आप में बाकी है? प्रदेश की बदहाल शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने में शिक्षकों अहम भूमिका है इसलिए सरकारी स्कूलों की हालत में तब्दीली का प्रण लिजिए यकीनन जनता जागेगी और अहंकारी सरकार अपने घर को लौटेगी ।


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