आईपीएस कुमार आशीष -जिनकी बदौलत फ्रांस सहित पूरी दुनिया में गुँज रही है “महापर्व छठ” की महिमा

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यहिया सिद्दीकी
संपादक

“हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है!
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा!!”

सर अल्लामा इक़बाल ने शायद यह शेर बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी  कुमार आशीष के लिए ही  कहा था। कदाचित् श्री आशीष नरगिस ए बिहार के नूर हैं । ऊर्जावान दीदावर हैं। 2012 बैच के इस पुलिस अधिकारी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे “बिहारी” हैं। उनके रग-रग  में बिहार, बिहारियत और बिहारी परंपरा पूरे वेग से  दौड़ रही  है।  वे अपनी मिटटी की सौंधी महक को पूरी दुनिया में बिखेरने का माद्दा रखते हैं। उनकी ही कलम के प्रताप से आज बिहारी संस्कृति की खास पहचान “महापर्व छठ पूजा” की महिमा  फ्रांसीसी भाषाई देशों सहित पूरी दुनिया में गुँज रही है। बिहार के इस आईपीएस लाल का कमाल ही है कि इन्होंने महज अपने कलम के माध्यम से महापर्व “छठ” को बिहार के बाहर पूरी दुनिया में विख्यात कर दिया ।

सनद रहे कि बिहार के “महापर्व छठ” की महिमा अपरंपार और  निराली है। सदियों से बिहारवासियों के मन में अपनी मिटटी और संस्कृति के प्रति लगाव और महान आस्था का संगम है ये त्यौहार। यह पर्व उन तमाम बिहारवासियों के लिए ख़ास हो जाता है जो इस वक़्त बिहार की पावन धरा पर कार्यरत ना होकर देश-विदेश के किसी और छोर पर होतें है। ऐसी ही कुछ निराली तथा खास  बात बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी  कुमार आशीष के साथ सन 2006-2007 में यहाँ से 9000 किलोमीटर दूर फ्रांस में हुई थी।

बता दें की श्री आशीष भारतीय पुलिस सेवा के 2012 बैच के अधिकारी हैं और अब तक बिहार के  मधेपुरा और  नालंदा जिले  के बाद फिलहाल किशनगंज  एसपी पद पर अपनी सेवा दे रहे  हैं और अपने सामुदायिक पुलिसिंग के विभिन्न सफल प्रयोगों के लिए बिहार सहित पूरे देश में जाने जाते हैं।

जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से इन्होंने फ्रेंच भाषा में स्नातक, स्नातोकोत्तर तथा पीएचडी भी किया है। पुलिसिंग के साथ  पठन-पाठन और लेखन में भी उनकी व्यापक रूचि रही है और अबतक विभिन्न विषयों पर उनके  दर्जनों लेख विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में  प्रकाशित हो चुके हैं।

“द रिपब्लिकन टाइम्स” से बात करते हुए  आशीष  बताते हैं की आज से 10 साल पूर्व जब वो फ्रांस में स्टडी टूर पर गए थे, तब वहां एक संगोष्ठी में कुछ फ्रेंच लोगों ने उनसे बिहार के बारे में कुछ रोचक और अनूठा बताने को कहा..तब उन्होंने बिहार के महापर्व छठ के बारे में विस्तार से उनलोगों को समझाया। इस जानकारी से फ्रेंच लोग काफी प्रभावित हुए और उन्होंने कहा की इस विषय पर फ्रांस के साथ फ्रेंच बोलने-समझने वाले  देशों तक भी इस पर्व की महत्ता और पावन सन्देश पहुँचाना चाहिए। उनकी प्रेरणा से कुमार आशीष ने वापस स्वदेश लौटकर इस पर्व के बारे में और गहन अध्ययन एवं बारीकी से शोध कर छठ पर्व को पूर्णत: परिभाषित करनेवाला एक लेख “Chhath Pouja: l’adoration du Dieu Soleil” लिखा जो कि भारत सरकार के अंग भारतीय सांस्कृतिक सम्बन्ध परिषद् दिल्ली के द्वारा फ्रेंच भाषा में “rencontre avec l’Inde” नामक किताब में सन 2013 में प्रकाशित हुआ।


इस लेख में श्री आशीष ने छठ पर्व के सभी पहलुओं का बारीकी से विश्लेषण कर फ्रांसीसी भाषा के लोगों के लिए इस महापर्व की जटिलताओं को समझने का एक नया आयाम दिया है। लेख के शुरुआत में वे बताते है की छठ मूलत: सूर्य भगवान् की उपासना का पर्व है। चार दिनों तक चलनेवाले इस पर्व में धार्मिक, सामाजिक, शारीरिक, मानसिक एवं आचारिक-व्यावहरिक कठोर शुध्दता रखी जाती है।

‘छठ’ शब्द सिर्फ दिवाली के छठे दिन का ही द्योतक नहीं है, बल्कि ये इंगित करता है की भगवान् सूर्य की प्रखर किरणों की सकारात्मक ऊर्जा को हठ योग के छः अभ्यासों के माध्यम से एक आम आदमी कैसे आत्मसात कर सभी प्रकार के रोगों से मुक्त हो सकता है? इस पर्व के हर छोटे से छोटे विधान की योगिक और वैज्ञानिक महत्ता है। मसलन, साल में दो बार क्यों मनाया जाता है यह पर्व? सूर्य की उपासना के वक़्त जल में खड़े रहने का आधार क्या  है? डूबते और उगते सूर्य को अर्घ्य देने के पीछे का विचार क्या  है? सूप और दौरे का पूजा में क्या महत्व है?लेख में उन्होंने बताया है कि यह पूजा ऋग्वेद काल से शुरू हुई। महाभारत में धौम्य ऋषि के कहने पर द्रौपदी ने पांचो पांडवों के साथ छठ पर्व कर सूर्य की कृपा से अपना खोया राज्य वापस प्राप्त किया था।

बिहार में इसका प्रचलन सूर्यपुत्र अंगराज कर्ण से शुरू होना माना जाता है।बिहार के तीनों बड़े प्रभागों यथा मगध, भोजपुर और मिथिला में बड़े धूमधाम से यह पर्व मनाया जाता है। मिथिला के क्षेत्र में ‘कोसी भरना’ भी किया जाता है जिसमें मानव-शरीर के पंचतत्व के प्रतीक रूप में पांच गन्ने एक साथ लगाये जाते हैं और उन्हें ऊष्मा प्रदान करने के लिए चारो तरफ से मिटटी के दिए लगाये जाते हैं। जिस घर में नयी शादी या नए बच्चे का आगमन होता है वह परिवार   बड़ी निष्ठा से ये रीति निभाते हैं।

बिहार के जमुई जिलान्तर्गत सिकंदरा प्रखंड के   रहनेवाले आईपीएस श्री आशीष अपने फ्रेंच भाषाई लेख के माध्यम से विदेशों तक छठ पर्व की महिमा का प्रचार-प्रसार कर रहे हैं जो काबिले तारीफ है। उल्लेखनीय है कि श्री आशीष को फ्रांस में हुई उसी मीटिंग में बिहार में रहकर बिहार के लिए कुछ करने की भी प्रेरणा मिली थी। वे बताते  है  कि  एक फ्रेंच वृद्धा मादाम निकोले ने उनसे बिहार के पिछड़ेपन का कारण पूछा था और तब तमाम तथ्यों में एक ये भी तथ्य उभर कर सामने आया था कि बिहार के प्रतिभाशाली लोग भारत सहित  अन्य विदेशी जगहों पर अपने-अपने क्षेत्रों में हमेशा आगे रहते हैं, लेकिन वे बिहार वापस लौटना पसंद नहीं करते। इस कारण बिहार से प्रतिभा का पलायन रुक नहीं रहा है और परिणामस्वरूप बिहार पिछड़ा राज्य बना हुआ  है।

उक्त  तथ्यों को चुनौती के रूप में लेते हुए श्री आशीष फ्रांस से लौटकर वापस आये और संघ लोक सेवा आयोग  की कठिन परीक्षा पास कर भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी बन कर अपने गृह राज्य में सेवा दे रहे हैं। मोतिहारी, दरभंगा, बलिया-बेगुसराय, मधेपुरा  नालंदा और किशनगंज  सहित  जहाँ भी उन्होंने कार्य किया है, अपने बिहार की मिटटी के प्रति सच्ची आस्थावश जरुरतमंदों को त्वरित न्याय प्रदान करने का कार्य कर लोगों को दिलों में अपनी अमिट छाप छोड़ी है। वे लगातार  सामुदायिक- सांस्कृतिक कार्यों की बदौलत क्रूर पुलिसिंग का चेहरा बदल कर पब्लिक-फ्रेंडली बनाने में कामयाब रहे हैं। लिहाजा अपराध नियंत्रण में काफी सहायता मिल रही  है और  पुलिस तथा सरकार के प्रति  आम लोगों का विश्वास भी बढ़ा है।

श्री आशीष ने समस्त  बिहारियों को छठ पर्व की शुभकामनाएं देते हुए यह भी कहा है कि  अब समय आ गया है कि पूरे विश्व में जहाँ भी बिहारी डायस्पोरा के लोग हैं। वे इस अवसर पर अपने-अपने तरीके से आगे आयें और बिहार की सांस्कृतिक समृद्धि, विरासत और बुद्धत्व से पूरे विश्व को जाग्रत करें।
“द रिपब्लिकन टाइम्स” परिवार बहुमुखी प्रतिभा के धनी आईपीएस अधिकारी  कुमार आशीष के उज्ज्वल भविष्य की कामना इन पंक्तियों के साथ करता है…

तमीज तहजीब अदब जिंदगी में बोलती है, 

लाख छुपाएं इंसान पर शख्सियत निशां छोड़ती है ।

जय हिंद – जय बिहार!


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