मधेपुरा सदर अस्पताल, मौत बांटने की फैक्ट्री है क्या? लापरवाही से आज फिर एक चार माह की बच्ची की मौत

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अमन कुमार
संवाददाता, सदर
मधेपुरा

मधेपुरा/बिहार : सदर अस्पताल के डॉक्टर, और अस्पताल प्रशासन की लापरवाही के कारण आज फिर एक चार माह की बच्ची की मौत, इलाज के लेकर ओपीडी से इमरजेंसी फिर इमरजेंसी से ओपीडी के चक्कर लगाने के दौरान माँ की गोद में ही तड़प-तड़प कर हो गई। इस हादसे ने एक बार फिर सरकारी अस्पताल के डॉक्टर और अस्पताल प्रशासन की मनमानी और लापरवाही को सामने लाकर रख दिया।

घटना के बाद आक्रोशित परिजनों सदर अस्पताल के सामने मुख्य सड़क को जामकर बच्ची की मौत का जिम्मेदार डॉक्टर डीपी गुप्ता को बताते हुए प्राथमिकी दर्ज करने की मांग करने लेगे। वहीँ सड़क जाम की जानकारी मिलते ही मौके पर पहुंची सदर थाना की पुलिस द्वारा आक्रोशित परिजनों को समझने का और इस मामले में दोषियों पर उचित करवाई करने का आश्वासन देने के बाद आक्रोशित लोग शांत हुए जिसके बाद सड़क जाम खत्म हुआ।

वीडियो :

क्या है पूरा मामला

मधेपुरा जिला अंतर्गत सिंघेश्वर प्रखंड के पटोरी गॉंव निवासी बाबलु ऋषिदेव की चार माह की बच्ची प्रतिभा कुमारी की तबियत काफी थी।  गुरूवार को बच्ची का नाना भरत ऋषिदेव, बच्ची का इलाज करवाने सदर अस्पताल में कार्यरत डॉक्टर डीपी गुप्ता के निजी क्लिनिक में पहुंचे जहाँ के बताया गया कि डॉक्टर साहब अभी सदर अस्पताल के ओपीडी में हैं, बच्ची को वही ले जाकर दिखवा लें।

इमरजेंसी वार्ड का एंट्री रजिस्टर

बच्ची की मां बबली देवी ने बताया कि प्रतिभा को रात में बुखार आ गया था। गुरूवार को वह अपने पिता भरत ऋषिदेव (बच्ची का नाना)  के साथ बच्चे को डॉ डीपी गुप्ता निजी क्लिनिक  ले गई तो वहां मौजूद कर्मी उनसे 200 रुपए लेकर यह कहकर भेज दिया कि सदर अस्पताल में डॉ डीपी गुप्ता बैठे हैं, वही चले जाएं। लगभग 11 :45 में परिजन अस्पताल पहुंचे और जब डॉक्टर से मिलने की कोशिश करने लगे तो बच्ची की हालात बेहद नाजुक रहने की बावजूद वहां मौजूद गार्ड ने उन्हें लाइन से आने को कहा, और उन्हें नहीं मिलने दिया गया। कुछ देर बाद डॉ ने उन्हें इमरजेंसी में दिखाने को कहा। बच्ची को परिजन इमरजेंसी वार्ड लाए तो वहां भी किसी डॉक्टर ने बच्ची का इलाज नहीं किया। उसके बाद लगभग दो घन्टे तक परिजन इमरजेंसी और ओपीडी का चक्कर लगाते रहे। लेकिन किसी ने बच्ची की नाजुक हालत देखकर उसका इलाज करना मुनासिब नहीं समझा नतीजा चार माह की बच्ची अपनी माँ की गोद में ही तड़प-तड़प कर दम तोड़ दी ।

परिजनों ने इस घटना का जिम्मेदार सीधे तौर पर डॉक्टर डीपी गुप्ता को बताकर अस्पताल के आगे मेन रोड जाम कर  दोषी डॉक्टर पर कारवाई की मांग करने लगे । लगभग एक घन्टे बाद सूचना पर पहुंची सदर थाने की पुलिस और कमांडो दस्ता ने परिजनों को समझा बुझाकर जाम हटवाया । परिजनों ने बताया कि हम डॉ डी पी गुप्ता के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराकर प्रशासन से उचित न्याय की आशा रखते है ।

सड़क जाम करते आक्रोशित लोग

डॉक्टर से लेकर अस्पताल प्रशासन ने कहा इमरजेंसी वार्ड में भारती कर बच्ची का हुआ इलाज, लेकिन एंट्री रजिस्टर में बच्ची का दर्ज नहीं है नाम :

सदर अस्पताल में आये दिन इस तरह की लापरवाही के कारण हो रही मौते को गंभीरता पूर्वक लेते हुए “ द रिपब्लिकन टाइम्स” की टीम जब इस पूरे मामले की तहकीकात की तो, बच्ची का इमरजेंसी वार्ड में इलाज हुआ है, इसका प्रमाण इमरजेंसी वार्ड के एंट्री रजिस्टर में कहीं नहीं मिला, जिससे साफ़ जाहिर होता है कि बच्ची को ना तो इमरजेंसी वार्ड में भर्ती किया गया और ना ही बच्ची का वहां इलाज किया गया, सिर्फ ओपीडी वार्ड में आम मरीजों की तरह ही उस बच्ची को देख कर कुछ दवाई लिख कर डॉक्टर ने अपनी जिम्मेदार से मुंह मोड़ लिया ।

मालुम हो कि घटना के बाद जब सिविल सर्जन से मोबाइल पर घटना के संबंध में बात की गई तो सिविल सर्जन ने कहा कि बच्ची को निमोनिया की बिमारी थी जिस कारण बच्ची की मौत हो गई, जब उनसे पूछा गया कि क्या बच्ची का इलाज हुआ तो उन्होंने कहा कि हां बच्ची का इलाज डॉक्टर डीपी गुप्ता ने किया है, लेकिन बच्ची को निमोनिया की बिमारी थी, इस लिए बच्ची की मौत हो गई। परिजनों द्वारा इलाज में में बरती गई लापरवाही को उन्होंने सिरे से खारिज कर कहा कि मैं ने डॉक्टर से बात की है, उन्होंने बताया है कि बच्ची का इलाज हुआ है। सवालों में खुदको फंसता देखता सिविल सर्जन ने बांकी जानकारी अस्पताल के डीएस से लेने की बात कहकर अपना पल्ला झाड लिया

और जब डीएस से मोबाइल पर इस संबंध में बात की गई तो उन्होंने ने भी बच्ची का इलाज इमरजेंसी वार्ड में होने की बात। यही सवाल अस्पताल प्रबंधक से पूछा गया तो उन्होंने ने भी बच्ची का इलाज इमरजेंसी वार्ड में होने का दावा किया, लेकिन हैरान करने वाली बात यह है कि इमरजेंसी वार्ड के एंट्री रजिस्टर में दर्ज आज की तारीख में आने वाले मरीजों की फेहरिस्त में कहीं भी बच्ची का नाम दर्ज किया हुआ नहीं मिला। जिससे साफ़ जाहिर होता है कि सरजमीं सच्चाई से ना तो सिविल सर्जन ना डीएस और ना ही अस्पताल प्रबंधक वाकिफ थे, सभी डॉक्टर की बात कर यह मान लिए की बच्ची का इलाज इमरजेंसी वार्ड में हुआ, लेकिन बच्ची की हालत नाजुक थी जिससे बचाजा नहीं जा सका।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि जिंदगी और मौत किसी के हाथ में नहीं, डॉक्टर सिर्फ कोशिश ही कर सकते हैं, बांकी कुछ नहीं। लेकिन यहाँ तो इमरजेंसी वार्ड का एंट्री रजिस्टर यह साबित करता है बच्ची को बचाने की कोशिश किसी ने की ही नहीं, बस खानापूर्ति कर बच्ची को मरने के लिए छोड़ दिया गया ।

बहरहाल इस पूरे मामले में बच्ची के इलाज करने का सदर अस्पताल के डॉक्टर और अस्पताल प्रशासन की दावे की पोल अस्पताल का एंट्री रजिस्टर ने खोलकर रख दिया है और साथ ही यह भी जाहिर कर दिया की गरीब मरीजों की जान की कीमत रत्ती बराबर भी सरकारी अस्पताल के डॉक्टर और प्रशासन को नहीं है।


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